संसाधन पुस्तक समीक्षा

सूरीनाम के भारतवासियों की कहानी सुनाती पुस्तक

"दक्षिण अमेरिका महाद्वीप में बसे सूरीनाम में भारतवासियों ने पहला कदम आज से लगभग २०० साल पहले रखा था. मजदूरों के रूप में यहाँ आए भारतीय लोग अपनी भाषा, संस्कृति और संस्कारों को बचाने और बढाने के लिए लगातार प्रयासरत है. विदुषी लेखिका भावना सक्सेना की पुस्तक -सूरीनाम में हिन्दुस्तानी - इन्ही प्रयासों की गाथा सुनाती है. "

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प्रसिद्ध हिन्दी सेवी और लेखिका श्रीमती भावना सक्सेना की ये पुस्तक चार भागों में विभाजित है – देश और भाषा, साहित्य, संस्कृति और साक्षात्कारों के आईने में. इस पुस्तक के तीसरे खंड साहित्य के अंतर्गत सूरीनाम के अनेक प्रमुख कवि और लेखकों का परिचय भी दिया गया है और सूरीनाम में हिंदी में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं की जानकारी भी है.ये पुस्तक सूरीनाम में हिंदी के विकास की तथ्यात्मक जानकारी देती है और सूरीनाम में प्रचलित सरनामी हिंदी के विकास की कहानी भी बताती है. इसमें सूरीनाम के कई विशिष्ट व्यक्तियों के साक्षात्कार भी हैं.

इस तरह ये किताब एक दर्पण की तरह है जो विश्व भर में फैले विराट हिन्दी भाषी समुदाय को सूरीनाम में बसे भारतीय समाज का सही चित्र दिखाती है. कई देशों में रहने वाले लेखक और पाठकों ने इस पुस्तक की भरपूर सराहना की है. प्रसिद्ध भाषाविद डॉ॰विमलेश कांति वर्मा कहते है कि ये एक किताब नहीं बल्कि सूरीनाम में

बसे हुए भारतवंशियों के  इतिहास,उनकेजीवन,आस्था-विश्वास,भाषा, साहित्य और संस्कृति का  हिंदी  में प्रामाणिक  विवेचन करने वाला  एक महत्वपूर्ण  ग्रन्थ है.मुझे  पूर्ण विश्वास है कि पुस्तक का विश्वव्यापी स्वागत होगा.भारत में सूरीनाम के पूर्व राजदूत श्री कृष्णदत्त बैजनाथ जी का कहना है कि ये शोधात्मक दस्तावेज़ इतिहास की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है.सरनामी कवि डा. जीत नारायण मानते है कि ये विद्यार्थियों के लिए काफी उपयोगी साबित होगा.

कुल मिलाकर ये पुस्तक बहुत ही रोचक ढंग से ये बताती है कि सौ दो साल पहले मजबूरी में भारत से बाहर जाकर बसे भारतीयों ने किन विपरीत परिस्थितयों में अपनी भाषा और संस्कारों को सहेजने की कोशिश की और आज उनकी नई पीढ़ी उनके इस संघर्ष को किस तरह से देखती है. इसलिए ये सिर्फ साहित्यिक किताब नहीं है बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेज भी है जिसे हर हिन्दी प्रेमी को एक बार ज़रूर पढना चाहिए.

योगदान : शीलनिधि गुप्ता
प्रकाशन दिनांक : 08-05-2012
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