संसाधन पुस्तक समीक्षा

कविता के रूप में गीता

"गीता सार्वकालिक ग्रंथ है. ये जीवन जीने की कला सिखाता है.संस्कृत न जानने वाले पाठकों भी गीता का वही काव्यगत आनन्द हिन्दी में मिल सके इस उद्देश्य से प्रो. सी. बी .श्रीवास्तव "विदग्ध" ने मूल संस्कृत श्लोक का हिन्दी में काव्यानुवाद किया है. ये काव्यानुवाद गीता को हिन्दी भाषा में प्रस्तुत करने का एक अनुपम प्रयास है."

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पहले भी कई कवि,लेखक और साहित्यकार गीता को कविता के रूप में अनूदित कर चुके है,अतः ये गीता का पहला काव्यानुवाद नही है मगर इसकी मौलिकता इसे सबसे अलग बनाती है.प्रो श्रीवास्तव ने ये प्रयास किया है कि गीता केश्लोकों को कविता का रूप देते समय उनका मूल भाव यथावत रहे. जैसे
गीता के पांचवे अध्याय के इस श्लोक को उन्होंने कुछ इस तरह से कविता में ढाला है

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌ ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌ ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि ॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌ ॥

स्वयं इंद्रियां कर्मरत,करता यह अनुमान
चलते,सुनते,देखते ऐसा करता भान।।8।।
सोते,हँसते,बोलते,करते कुछ भी काम
भिन्न मानता इंद्रियाँ भिन्न आत्मा राम।।9।।

अनुवाद में दोहे को छंद का रूप देते हुए इसी तरह उन्होंने गीता के सभी श्लोकों को हिंदी कविता के रूप में उतार दिया है. साहित्य मनीषी कविश्रेष्ठ प्रो. चित्रभूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध‘‘ भारतीय साहित्य और धर्मग्रंथो के कुशल अध्येता भी हैं और भावुक कवि भी.इसके पहले उन्होंने ‘‘मेघदूतम्‘‘ और रघुवंशम् काव्य का भी काव्य के रूप में अनुवाद किया है. इसके माध्यम से आम लोग गीता के सिद्धांतो को बेहतर ढंग से समझ सकेंगे. इस किताब का प्रकाशन हरियाणा के अर्पित प्रकाशन ने किया है.इसे यहाँ से (ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी रामपुर , जबलपुर म. प्र. ४८२००८) मंगाया जा सकता है.

समीक्षक - श्रीमती विभूति खरे , ए ७ , यश क्लासिक , सुस रोड ,पाषाण , पुणे ..२१
योगदान : Vivek Ranjan Shrivastava
प्रकाशन दिनांक : 27-05-2013
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