संसाधन संस्कृति

संस्कृत की तरफ बढ़ रहा है पश्चिमी जगत

"बड़ी अजीब बात है अपनी संस्कृति की जिन विरासतों से भारत का बौद्धिक समाज दूर होता जा रहा है, पश्चिम का बौद्धिक समाज उन्ही को बेहद सम्मान के साथ अपना रहा है. संस्कृत भाषा भी भारत की ऐसी ही एक विरासत है.इंटरनेट के माध्यम से संस्कृत विश्व के कई देशों में अपनी जगह बना रही है और बौद्धिक क्षमता से पूर्ण लोग इसे खूब आत्मीयता के साथ अपना रहे है. "

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“हम न्यूयार्क मे एक ऐसे टेटू (शरीर पर बनने वाले निशान जिन्हें भारत मे गोदना कहा जाता है) विशेषज्ञ को तलाश रहे है जो संस्कृत केलीग्राफी (सुलेखन) मे प्रवीण हो, यदि ऐसा कोई व्यक्ति आपकी  जानकारी में हो तो कृपया बताए” कुछ समय पहले याहू के एक प्रश्नोत्तर मंच  पर किसी अमेरिकन व्यक्ति ने ये प्रश्न पूछा था. इसके जवाब में वही के एक सज्जन ने उन्हें ये वेबसाईट  सुझाई जिस पर नेट पर संस्कृत के कई महत्वपूर्ण संसाधन दिए गए है.
पिछले कुछ सालों से भारत के कुछ कथित बुद्धिजीवी संस्कृत को मृतभाषा घोषित करने की एक मुहिम चला रहे है. इन लोगों के कुप्रचार में आकर भारत सरकार ने सरकारी स्कूलों से इसे हटाने का फैसला भी कर लिया है. ये उदाहरण उन लोगो को हैरान कर सकता है मगर उनकी हैरानी बढाने के ऐसे और भी कई उदाहरण इस आभासी जगत में मौजूद है जो ये बताते है कि संस्कृत उस विशिष्ट बौद्धिक समाज में भी अपनी जगह बना रही है जो बौद्धिक विश्व का नेतृत्व कर रहा है और उस युवा समुदाय में भी जिसे फैशन का सरपरस्त कहा जाता है.
पहले बात करते है फैशनपरस्त नौजवानों की.पिछले कुछ सालों से अमेरिका और यूरोप के देशों में रहने वाली  युवा पीढ़ी नेट के माध्यम से संस्कृत के संपर्क मे आई थी. देवनागरी मे लिखे संस्कृत के शब्दों के आकार और आकृति ने उन्हें इतना सम्मोहित किया कि वहा अपने शरीर पर मन्त्र गुदवाने, मन्त्रों के आकार और आकृति के गहने पहनने,इनके प्रिंट के ग्रीटिंग्स भेजने,कपडे पहनने और यहाँ तक कि स्टेशनरी मे भी इनका प्रयोग फैशन का हिस्सा बन गया.ये फैशन वहाँ इस कदर धूम मचा रहा है कि स्टीवर्ट थामस नामक एक डिजाइनर ने इसके लिए अपनी एक वेबसाईट ही बनवा ली है.कपड़ों और गहनों में शब्दों का प्रयोग भाषा के महत्त्व को रेखांकित नहीं करता मगर ये भाषा के प्रति बढती रूचि का प्रतीक तो है.
भारत के कुछ लोगों को ये जानकार और आश्चर्य होगा कि सिर्फ अमेरिका में दस से ज़्यादा ऐसे संस्थान है जहां उच्च स्तर पर संस्कृत पढाई जाती है.इंटरनेट संस्कृत के प्रसार में सहयोगी की भूमिका निभा रहा है. पूरे विश्व मे हज़ारो लोग इंटरनेट के माध्यम से संस्कृत सीख रहे है.हिन्दी और अंगरेजी माध्यम से संस्कृत सिखाने के लिए बीस से भी ज़्यादा वेबसाइट्स है.जिन्हें संस्कृत की संस्थाएं अथवा विद्वान संचालित कर रहे है.यूरोप और आस्ट्रेलिया मे संस्कृत के लिए समर्पित अमेरिकन संस्कृत इंस्टीट्यूट अपनी इस साईट के माध्यम से संस्कृत की आनलाइन क्लासेस लगा रहा है और संस्कृत सीखाने के लिए बनाई गयी मल्टीमीडिया सीडीस का प्रचार भी कर रहा है.उनकी साइट पर आने वाले संस्कृत प्रेमियों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है.
कड़वा  सच ये है कि भारत अब अनुकरण करने वाले लोगों का देश बन गया है. कुछ साल बाद जब पश्चिम जगत का बौद्धिक समुदाय संस्कृत के रंग में रंगा दिखेगा हो सकता है तब भारत को भी संस्कृत का महत्त्व समझ में आ जाए और हो सकता है कि तब भारत सरकार जर्मनी या अमेरिका के किसी संस्थान से भारत के स्कूलों में  संस्कृत पढाने के लिए कोई अनुबंध करें.


प्रकाशन दिनांक : 14-08-2012
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