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क्या हम आज़ाद है ?

"पहले सरकारी सेवा से रिटायरमेंट की आयु ५८ वर्ष थी फिर ६० हुई. कुछ बुद्विजीवियो को ६२ वर्ष तक काम करने के बाद रिटायर किया जाता है. आज हमारी आजादी के ६५ साल पूरे हो गए है.इस हिसाब से तो हमारी आजादी रिटायर हो चुकी हैं.ये जुमला सिर्फ भावनाओं में उफान लाने के लिए नही है. ये एक ऐसी सच्चाई है जो ये सोचने को मजबूर करती है कि क्या हम वास्तव में आज़ाद है ? "

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क्या भारत वाकई १५ अगस्त १९४७ को आज़ाद हुआ था या ये आज़ादी दिल को बहलाने का कोई ख्याल है जिसने पिछले ६५ सालों से हमें झूठ पर बसी एक दुनिया में लाकर खडा किया हुआ है. क्या हम वाकई आज़ाद है या कोई ऐसी ताकत है जो आज़ादी के ख़्वाब दिखाकर आज भी हम पर राज कर रही है, जो हमारे लिए होकर भी हमारी नहीं है.जो अपनी होते हुए पराई है और जो अपना गला काटकर दूसरों का पेट भरने में लगी है. यदि हम वाकई आज़ाद है तो ये कैसी आज़ादी है जो अपने नुमाइंदों का गला व्यवस्था के बोझ से दबाने में लगी हुई है. ये कैसी आज़ादी है जिसमें सरकार अपना खजाना भरने के लिए आम आदमी का गला भी काट रही है और जेब भी.जिसने आम आदमी की रोटी भी महंगी कर दी है और कफ़न भी.ये कैसी आजादी है जो जिन्दों से ज़िंदा होने का और मुर्दों से उनकी मौत का प्रमाण-पत्र मांगती है.

गांधीजी अक्सर कहते थे कि अंग्रेज भले भारत में रह जाए मगर अंग्रेजी और अंग्रेजियत यहाँ से चली जाए मगर हुआ इसका ठीक उलटा. अंग्रेज यहाँ से चले गए मगर अधिकारियों के रूप में अंग्रेजियत उसी ठसके के साथ बनी रही और हर १५ अगस्त के बाद उसका ठसका और भी बढता गया.कई बार लगता है कि १५ अगस्त १९४७ के दिन भारत आजा़द नही हुआ था सिर्फ सत्ता का स्थानांतरण हुआ था. पहले जिन कानूनों के दम पर अंग्रेज हम पर राज करते थे आज उन्ही के दम पर आईएएस और नेता करते है.आज की व्यवस्था भी अंग्रेजी सभ्यता की तरह दिखती है.

लगता है उस १५ अगस्त को सिर्फ हुक्मरान बदले थे.गोरे गए काले आए. बस इतना ही हुआ था.ये ठीक ऐसा ही था कि मानों छोटे पिंजरे में कैद किसी पंछी को आज़ाद आसमान का झांसा देकर बड़े चिडियाघर में डाल दिया जाए. जहां वो पंख तो फैला सकता है उड़ नहीं सकता. तब से आज तक भारत का आम आदमी अपने पंख फैलाए बैठा है और नौकरशाही और नेतागिरी के जाल को काटने की कोशिश कर रहा है. हमारी वर्तमान व्यवस्था भी व्यक्ति को ढ़ीठ बनाने का काम करती हैं। आज के दिन लगता है कि सच्ची आज़ादी आज भी भारत से उतनी ही दूर है जितनी वो १५ अगस्त के पहले थी.आज भी आम आदमी उतना ही बेबस,लाचार और मजबूर है जितना पहले था. बस आज के दिन से ये उम्मीद है कि भारत के आम आदमी की ये बेबसी,लाचारी और मजबूरी लंबे समय तक उन उम्मीदों को और उन सपनों को नहीं तोड़ पाएगी जो इस देश का भविष्य लिखेंगे.

योगदान - सुबोध और अमित त्यागी 



 



प्रकाशन दिनांक : 14-08-2012
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