हिंदी जगत

दम तोडती साहित्यिक अकादमियां

"भारत के लगभग हर राज्य में सरकार द्वारा स्थापित साहित्य अकादमी है.वैसे तो इनका काम रचनात्मक लेखन को प्रोत्साहित करना और लोगों को साहित्य से जोड़ना है लेकिन पिछले कुछ दशकों से लगभग हर राज्य में साहित्य अकादमी के कर्ता धर्ता अपनी सरकार की चरण वन्दना में लगे है.वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय ने इस बारे में जागरण में एक बहुत ही वैचारिक लेख लिखा है. जागरण की वेबसाईट से आभार पूर्वक लिया गया उनका ये लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है. "

sahitya academy delhi hindi academy bihar granth academy bihar rashtra bhasha parishad premchand srijan peeth niraala peeth

आजादी के बाद भारतीय भाषाओं में उत्कृष्ट लेखन को पुरस्कृत, संवर्धित और विकसित करने के एक बडे उद्देश्य को लेकर १९५४ में साहित्य अकादमी की स्थापना की गई थी, लेकिन अगर हम पिछले ५८ साल की उपलब्धियों पर गौर करें तो एक साथ विस्मय भी होता है और आश्चर्य भी. शुरुआती एक दशक के बाद से लगभग चालीस साल तक साहित्य अकादमी अपने उद्देश्य से भटकती रही. अस्सी और नब्बे के दशक में तो साहित्य अकादमी की प्रतिष्ठा बेहद धूमिल हुई. जिस तरह से हिंदी के कर्ताधर्ताओं ने उस दौरान पुरस्कारों की बंदरबांट की थी, उससे अकादमी की साख को तो बट्टा लगा ही, उसकी कार्यशैली पर भी सवाल खडे होने लगे थे. फिर साहित्य अकादमी के चुनावों में जिस तरह से खेमेबंदी और रणनीतियां बनीं, उससे भी वह साहित्य कम, राजनीति का अखाडा ज्यादा बन गई थी.

गोपीचंद नारंग और महाश्वेता देवी के बीच हुए अध्यक्ष पद के चुनाव के दौरान तो माहौल एकदम से साहित्य के आमचुनाव जैसा था. गोपीचंद नारंग के चुनाव जीतने के बाद साहित्य अकादमी की स्थिति सुधरी. वर्षो से विचारधारा के नाम पर अकादमी पर कुंडली जमाए मठाधीशों की सत्ता का अंत होने से तिलमिलाए लोगों ने नारंग पर कई तरह के आरोप लगाए. उन्हें हटाने की मांग की गई, लेकिन उस दौर में अकादमी ने अपना भव्य स्वर्ण जयंती समारोह तो मनाया ही, कई बेहतरीन कार्यक्रम कर आलोचकों को मुंहतोड जवाब दिया. हाल के दिनों में जब से विश्वनाथ तिवारी साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष बने हैं तो अकादमी के कार्यक्रमों में विविध लेखकों की सहभागिता काफी बढी हैं.
साहित्य अकादमी के अलावा अगर हम अन्य राज्यों के हिंदी साहित्य, कला और संस्कृति को बढावा देने के लिए बनाई गई अकादमियों पर विचार करें तो हालात बेहद निराशाजनक नजर आते हैं. दिल्ली की हिंदी अकादमी तो सरकार के सूचना और प्रसारण विभाग में तब्दील हो गई है. हिंदी अकादमी की संचालन समिति की पिछले कार्यकाल में एक भी बैठक नहीं हो पाई थी. दिल्ली सरकार हिंदी अकादमी का नियमित सचिव नियुक्ति नहीं कर पाई और एडहॉक सचिव से लंबे समय तक काम चलाती रही. इससे साहित्य को लेकर सरकार की गंभीरता का भी पता चलता है. 
एक जमाने में लाल किले पर होने वाली कवि गोष्ठी दिल्ली की हिंदी अकादमी का प्रतिष्ठित कार्यक्रम हुआ करती थी, लेकिन बाद में कवियों के चयन में मनमानी और उपकृत करने की मनोवृत्ति सामने आई, उससे लालकिले का आयोजन रस्मी होकर रह गया. इसके अलावा हिंदी के प्रचार प्रसार के उद्देश्य से जो किताबें छपीं, वे भी स्तरहीन होकर पुस्तकालयों की शोभा बढाने वाली बनकर रह गई.अकादमी की प्रतिष्ठित पत्रिका इंद्रप्रस्थ भारती का आज कहीं कोई नामलेवा नहीं रहा.दसियों साल से दिल्ली की हिंदी अकादमी दिल्ली के युवा लेखकों के प्रोत्साहन के लिए पुस्तक प्रकाशन योजना के तहत दस हजार रुपये का अनुदान देती आ रही है. महंगाई चाँद तक जा पहुँची लेकिन इस अनुदान राशि में कोई बदलाव नहीं किया गया.संघर्षरत युवा लेखकों को अपनी किताबें छपवाने के लिए दर बदर भटकना पड रहा है.
ये हाल सिर्फ दिल्ली की हिंदी अकादमी का नहीं है. हिंदी प्रदेशों में जितनी भी अकादमियां हैं, सब राजनीतिक नेतृत्व की बेरुखी और लेखकों की आपसी राजनीति का शिकार हो गई हैं. मध्य प्रदेश एक जमाने में साहित्य संस्कृति का अहम केंद्र माना जाता था. अस्सी के दशक में मध्य प्रदेश में इतनी साहित्यिक गतिविधियां हो रही थीं और सरकारी संस्थाओं से नए पुराने लेखकों के संग्रह प्रकाशित हो रहे थे कि अशोक वाजपेयी ने उस दौर में कविता की वापसी का ऐलान कर दिया था. न सिर्फ साहित्य, बल्कि कला के क्षेत्र में भी मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक संस्थाओं की सक्रियता चकित करने वाली थी.
मध्य प्रदेश में कई जगहों पर मुक्तिबोध, प्रेमचंद और निराला के नाम पर साहित्य सृजन पीठ खोले गए थे और उन पीठों पर हिंदी के मूर्धन्य लोगों को नियुक्ति दी गई थी, जिससे कि उन पीठों की साख शुरुआत से ही कायम हो पाई. लेकिन बाद में लेखकों की विचारधारा की लडाई और राजनीतिक सत्ता बदलने से मध्य प्रदेश में साहित्यिक सत्ता भी पलट गई. कालांतर में इन साहित्यिक संस्थाओं की सक्रियता और काम करने का स्तर भी गिरा. संस्थाओं पर भाई भतीजावाद के आरोप लगे. उनकी नियुक्तियों में धांधली की शिकायतें सामने आई. विचारधारा की लडाई और सरकार की बेरुखी से नुकसान तो साहित्य का ही हुआ.
मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान साहित्य अकादमी का भी बुरा हाल है. राजस्थान से निकलने वाली पत्रिका मधुमती का एक जमाने में हिंदी के पाठकों को इंतजार रहता था, लेकिन अब मधुमती कब आती है और कब गायब हो जाती है, उसका पता भी नहीं चल पाता. 
एक जमाने में बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, बिहार ग्रंथ अकादमी और बिहार साहित्य सम्मेलन की देशभर में प्रतिष्ठा थी और उनसे रामधारी सिंह दिनकर, शिवपूजवन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी जैसे साहित्यकार जुडे थे. लेकिन आज बिहार सरकार के शिक्षा विभाग की बेरुखी से ये संस्थाएं लगभग बंद हो गई हैं.
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के परिसर में सरकारी सहायता प्राप्त एनजीओ किलकारी काम करने लगा है. किलकारी पर सरकारी धन बरस रहा है, लेकिन उसी कैंपस में राष्ट्रभाषा परिषद पर ध्यान देने की फुर्सत किसी को नहीं है. बिहार ग्रंथ अकादमी का बोर्ड उसके दफ्तर के सामने लटककर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहा है. उसके अलावा बिहार साहित्य सम्मेलन में तो हालात यह है कि आए दिन वहां दो गुटों के बीच वर्चस्व की लडाई को लेकर पुलिस बुलानी पडती है. साहित्य सम्मेलन का जो भव्य हॉल किसी जमाने में साहित्यक आयोजनों के लिए इस्तेमाल में लाया जाता था, वहां अब साडियों की सेल लगा करती है. इन संस्थाओं के समृद्ध

पुस्तकालय देखभाल के आभाव में बर्बाद हो रहे हैं. बिहार के शिक्षा विभाग पर इन साहित्यक विभागों को सक्रिय रखने का जिम्मेदारी है, लेकिन अपनी इस जिम्मेदारी को निभा पाने में शिक्षा विभाग बुरी तरह से नाकाम है.
दरअसल, साहित्यिक संस्थाओं को लेकर नेहरू के विजन वाला कोई नेता अब देश में बचा नहीं. नेताओं को पढने-लिखने से ज्यादा तिकडमों और अपनी कुर्सी बचाने की फिक्र होती है. सरकार में शामिल लोगों की साहित्य का प्रति उदासीनता से इन संस्थाओं के खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है. वक्त आ गया है कि सरकार अपनी समृद्ध साहित्यिक संस्थाओं को बचाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए.
लेखक - अनंत विजय
ये लेख जागरण की वेबसाईट से आभारपूर्वक लेकर थोड़ा सा संपादित किया गया है.मूल लेख जागरण की इस साईट पर पढ़ा जा सकता है. 


प्रकाशन दिनांक : 30-07-2012
print

नवीनतम लेख

a summer camp was organised for teaching hindi in minsk city of belarus by alesia.
BOOK WRITER, POEM, POET, SUBODH