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बिखरे हुए अक्षरों का संगठन

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मैं जो दीप जलाये चलता हूँ ,
आंधियों ! बुझा न देना उसको
मैं जो राह बनाये चलता हूँ,
तूफानों ! मिटा न देना उसको
मैं
जिंदगी से,कितना लड़ा हूँ ,
बहारों वहारों ! बता न देना उसको
मैं मजबूरियों से दूर हूँ,
यादों ! सता न देना उसको,

मैं दुखों में उनके लिए हँसता हूँ,
आंसुओं ! रुला न देना उसको
मैं हर रोज आहें भरता हूँ,
ख्वाबों ! जता न देना उसको
मैं वेचैनी में जब देखना चाहूँ
घटाओं ! छुपा न देना उसको
मैं जो दीप जलाये चलता हूँ ,
आंधियों ! बुझा न देना उसको-----------
 
रचना-राजेन्द्र सिंह कुँवर 'फरियादी' 

 

योगदान : राजेन्द्र सिंह कुँ
प्रकाशन दिनांक :
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