ये कैसा अर्थज्ञान है ?


ये कैसा अर्थज्ञान है ?



करोड़ को करोड़ है, रोड वाला रोड है 



आमिर बन रहा आमिर, जल रहे हैं द्वार दीप 



और रोज फूंक रहे हैं, शव ! दरिद्र द्वार पर |



ये कैसा अर्थज्ञान है ?



जितने दन्त हैं दरिद्र, उतना उसको दान मान



और बाकियों का पुण्य, गज उदर सामान है |



ये कैसा अर्थज्ञान है ?



रो रही है सभ्यता , खो रही वो मान है



कोष अपना कर अपार, हँस रहा विधान है |



ये कैसा अर्थज्ञान है ?



हो रही धरा वीरान, ले रही है दास प्राण 



कर लगा के देखता वो ईश, सब महान है 



ये कैसा अर्थज्ञान है ?


योगदान : दिनेश आर्य
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