हिंदी जगत

मिलिए सिर्फ हिन्दी के लेखकों के चित्र बनाने वाले एक अदभूत चित्रकार से

"हिन्दी से प्रेम करने वाले लोगों की कोई कमी नहीं.दुनिया के कोने-कोने में ऐसे हज़ारों लोग है जिनकी रूह को छूकर हिन्दी उनके दिलो दिमाग में बस गई है. बनारस में रहने वाले विनय कुमार दुबे ऐसे ही एक शख्स है. वे ऐसे चित्रकार हैं जो अपने केनवास पर सिर्फ साहित्यकारों की ही तस्वीरे बनाते हैं. पढ़िए हिन्दी के प्रति लगन रखने वाले एक अदभूत चित्रकार की कथा. "

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बनारस में रहने वाले श्री विनय कुमार दुबे वैसे तो सरकारी कर्मचारी हैं किन्तु उनकी पहचान एक चित्रकार, वो भी एक जुनूनी चित्रकार के रूप में है. हिन्दी के प्रति उनके मन में गहरा लगाव और आत्मीयता है जिसे वे अपनी केनवास पर कूची से व्यक्त करते है.शौकिया तौर पर चित्र बनाने वाले इस अनूठे कलाकर्मी विनय की कूची केनवास पर  सिर्फ और सिर्फ हिन्दी सेवी साहित्यकारों के चित्र उकेरती है. अर्थात वे एक ऐसे चित्रकार हैं जो सिर्फ साहित्यकारों की ही तस्वीरे बनाते हैं. 

हिन्दी के प्रति इस अनोखे रुझान के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. जागरण से चर्चा में उन्होंने बताया कि कई वर्ष पहले प्रयाग में एक साहित्यिक संस्था, महाकवि जयशंकर प्रसाद की जयंती के आयोजन की तैयारी कर रही थी.  बहुत खोजने के बाद भी संस्था के लोगो को प्रसाद जी की कोई तस्वीर नहीं मिल पाई. ये बात जब विनय जी को पता चली तो उन्ही काफी तकलीफ हुई. तब उन्होंने पूरी रात जगकर अपनी स्मृति के आधार पर प्रसाद जी की तस्वीर बना डाली. उसी तस्वीर से अगले दिन प्रसाद जी की जयंती मनाई गई. विनय जी के इस कार्य की काफी सराहना हुई.

बस यहीं से उन्होंने संकल्प लिया कि वे पूरे जीवन हिन्दी सेवियों की तस्वीरे ही बनाएंगे. दो तीन दशकों में वे  १५०  से भी ज़्यादा हिन्दी सेवियों को केनवास पर उतार चुके है. इनमें लेखक भी है साहित्यकार भी है और पत्रकार भी.  ये सभी तस्वीरें उन्होंने अपने खर्चे से बनाई है. न तो इसके लिए अभी तक किसी से एक पैसे का सहयोग लिया और ना ही आगे लेना चाहते है. विनय कहते है जिन लोगों ने हिन्दी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया उनके लिए और अपनी मातृभाषा के इतना तो मुझे करना ही चाहिए. 

समाचार स्रोत - जागरण 
 

 

 

योगदान : सीएस. प्रवीण कुमार
प्रकाशन दिनांक : 19-05-2012
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