क्या अब बनारस के बच्चों को हिन्दी इतनी कठिन लगने लगी है ?

"ये हैरान करने वाली बात है कि हिन्दी के गढ़ के रूप में प्रसिद्ध बनारस में स्कूल के विद्यार्थी हिन्दी की परीक्षा में नक़ल कर रहे है.सवाल ये है कि क्या गोस्वामी तुलसीदास, कबीरदास और संत रविदास से लेकर मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल,जैसे लेखकों की कर्मस्थली के बच्चों को हिन्दी कठिन लगने लगी है? "

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परीक्षा के समय समाचार-पत्रों में नक़ल की खबरें छपना अब एक आम बात हो गई है, किन्तु जब जागरण में  प्रकाशित ये समाचार पढ़ा तो मन में कई सवाल उठने लगे.समाचार कहता है कि कुछ समय पहले माध्यमिक शिक्षा परिषद के एक दल ने बनारस में हिन्दी का पर्चा दे रहे ७ विद्यार्थियों को नक़ल करते हुए पकड़ा. इनमे चार छात्राएं भी थी.ये लोग हाईस्कूल की परीक्षा दे रहे थे. 

ये बात है वाराणसी यानी बनारस की. उस बनारस की जो सदियों से भारत में भाषा और संस्कृति का प्रतीक रहा है. जहां गोस्वामी तुलसी दास से लेकर कबीरदास और रविदास जैसे भक्ति परम्परा के संत लेखक हुए  है जिनकी लिखी या बोली गई बातें विश्व की धरोहर बन गई और सदियों से पढ़ी और दोहराई जा रही है. ये वो नगर है

 जहां मदन मोहन मालवीय ने हिन्दी को राष्ट्रीयता का स्वर दिया, जहां मुंशी प्रेमचंद से लेकर जयशंकर प्रसाद और आचार्य रामचंद्र शुक्ल जैसे लेखक हुए, जहां भाषा के संस्कार घुट्टी में मिले होते है वहाँ के बच्चों को हिन्दी में नक़ल करने की ज़रूरत क्यों पडी ये सच में एक बड़ा प्रश्न है. 

क्या अब बनारस के बच्चों को हिन्दी इतनी कठिन लगने लगी है ? क्या ये घटना इस बात का संकेत है कि  बनारस भाषा के संस्कारों से दूर हो रहा है ? ये बनारस के हिन्दी गुरुओं - शिक्षकों- का दोष है या उस समाज का जिसका हर व्यक्ति दूसरे को गुरु कहता है? आप क्या सोचते है ?यदि आप बनारस में रहते है या इस नगर से मन से जुड़े है या इसके बारे में कुछ जानते है या कहना चाहते है तो अपने विचार ज़रूर व्यक्त करें, क्योंकि ये सिर्फ नकल का प्रश्न नहीं है भाषा का है , भाषा से जुड़े संस्कारों का है. 

सुबोध खंडेलवाल 

 


प्रकाशन दिनांक : 15-04-2012
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