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क्या हिंदी के विकास के लिए भी ठाकरे जैसे लोग चाहिए ?

"देश के 11 राज्यों को हिंदी प्रदेश कहा जाता है लेकिन इन हिंदी राज्यों में भी हिन्दी की क्या स्थिति है इससे सभी वाकिफ हैं.यही कारण है कि मुझे इन राज्यों में ठाकरे बंधुओं जैसे लोगों की आवश्यकता महसूस होती है जिनके डर से ही सही हिंदी का दबदबा नजर आए.पढ़िए स्वतंत्र वाणी नामक हिन्दी चिट्ठे से लिया गया ये लेख "

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इसमें कोई दो राय नहीं कि भाषा के नाम पर राजनीति नहीं होनी चाहिए परंतु ठाकरे परिवार मराठी भाषा को बचाने के लिए जो कुछ करता है उससे पूरी तरह से असहमत होने के बाद भी उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. मराठी भाषा की अस्मिता के प्रश्न पर ठाकरे परिवार के तौर तरीकों से घोर असहमति और विरोध के बाद भी कई बार उनका समर्थन करने का मन करता है. जिन होर्डिंग्स को हम हिंदी प्रदेशों में द्विभाषी नहीं करा पाए हैं वहीं महाराष्ट्र में उनके डर के चलते चारों तरफ मराठी भाषा का बोलबाला है.मराठी भाषा और साहित्य के विकास की बात हो या मल्टी्प्लैक्सों में मराठी सिनेमा को बढ़ावा देने की हर तरफ डंके की चोट पर कहा जाता है करो या भुगतो. यहीं कारण है कि कांग्रेस के मुख्य‍मंत्री ने मराठी भाषा के विकास के लिए एक अलग मंत्रालय तक खोल दिया है और तो और वो अब संविधान की भावना के प्रतिकूल अपने प्रदेश के केन्द्रीय सरकार के कार्यालयों में भी मराठी का प्रयोग चाहते हैं. इसके लिए उन्होंने केंद्र सरकार को लिखा भी है. महाराष्ट्र में बड़ी-बड़ी विदेशी कंपनियां भी मराठी भाषा को साथ लेकर आगे बढ़ रही है.

मैंने यह बातें व्या्पक तौर पर नहीं कहीं और न ही राजनीति के बारे में चर्चा करना चाहता हूं चूंकि इनकी सभी बातों का समर्थन नहीं किया जा सकता और हम जानते हैं कि केवल अपनी राजनीति के ही कारण ही यह लोग हिंदी का विरोध करने को मजबूर हैं. मैं केवल यह कहना चाहता हूं कि अगर ठाकरे परिवार महाराष्ट्र में मराठी अस्मिता के लिए प्रेरणा और प्रोत्साहन का रास्ता न अपनाकर तथाकथित 'एमएनएस या शिवसेना स्टाईल' रास्ता अपनाते हैं तो इसमें क्या बुराई है.

देश के 11 राज्यों को हिंदी प्रदेश कहा जाता है लेकिन  इन हिंदी राज्यों में भी हिन्दी की क्या स्थिति है इससे सभी वाकिफ हैं.यही कारण है कि मुझे इन राज्यों में ठाकरे बंधुओं जैसे लोगों की आवश्‍यकता महसूस होती है जिनके डर से ही सही हिंदी का दबदबा नजर आए.

ये लेख स्वतंत्र वाणी  नामक हिन्दी चिट्ठे से लिया गया है.न तो लेखक ठाकरे परिवार के समर्थक है और ना ही उनकी शैली के.वे किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा से भी जुड़े हुए नहीं है. अपने इस लेख के माध्यम से उन्होंने ये सवाल उठाया है कि हिन्दी प्रेमियों के आग्रह,प्रयास और निवेदन के बाद भी यदि हिन्दी भाषी राज्यों के लोग हिन्दी को दोयम दर्जे पर रखते है तो क्या हिन्दी के लिए  ठाकरे की शैली वाले कुछ लोगों की आवश्यकता है? ये विशुद्ध रूप से वैचारिक बहस का मुद्दा है. आप इस बारे में क्या सोचते है ? कृपया बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी राय रखे. 

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प्रकाशन दिनांक : 25-03-2012
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