विश्व में हिंदी

हिंदी से लगाव की एक कहानी

"हिन्दी में कुछ ऐसी मिठास है जो पराये को भी अपना बना लेती है, इसमें कुछ ऐसा अपनापन है जिसके चलते ये दिल में बस जाती है.भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर रहने वाली छ वर्ष की एक नन्ही बच्ची इसी अपनेपन के चलते हिंदी से जुडी थी.उसे लगता था कि हिंदी उसके पूर्व जन्म की भाषा है.उसे लगता था कि इस भाषा और इस संस्कृति से जुडा उसके पूर्व जन्म का कोई काम शेष रह गया है जो इस जन्म में पूरा करना है. "

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ये कहानी एक ऐसी बच्ची की है जिसे सिर्फ छ वर्ष की उम्र में हिन्दी भाषा से प्रेम हो जाता है.समय के साथ ये प्रेम इतना परवान चढता है कि उसके जीवन के मायने ही बदल जाते है.हिन्दी से लगाव के चलते, कई  मुश्किलों का सामना कर, बड़ी कठिनाई से हिन्दी की किताबें और शिक्षक ढूंढकर  भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर बसे अपने देश में वो हिन्दी सीखती है, हिन्दी की कशिश उसे भारत खींच लाती है, यहाँ आकर वो औपचारिक रूप से हिंदी सीखती है और फिर अपने देश में जाकर हिंदी की अलख जगाने में जुट जाती है.
वो अपने देश के लोगों को हिंदी पढ़ाना चाहती है मगर वहाँ के लोगों की हिंदी में बहुत ज़्यादा रूचि नहीं है, फिर भी वो हिम्मत नहीं हारती.अथक प्रयास कर वो हिंदी सीखने के उत्सुक कुछ लोगों का समूह बना लेती है. मुश्किलें यहाँ भी साये की तरह उसके साथ चल रही है. अब उसे एक ऐसी जगह की तलाश है जहां वो अपने विद्यार्थियों को ये सुन्दर भाषा सीखा सके, मगर उसे कही अच्छी जगह नहीं मिल पाती. जहां मिलती है उसका किराया चुकाना उसके वश की बात नहीं है.खैर जैसे-तैसे एक जगह मिलाती है और उसकी कक्षाएं शुरू होती है, मगर मुश्किलें अभी भी उसका साथ छोडने को तैयार नहीं है.
अब समस्या किताबों की है. उसके देश में ऐसी किताबें कहाँ है जिनसे हिंदी सिखाई जा सके ? वो अपनी पुरानी किताबें ढूँढती है जिससे वर्षों पहले उसने हिंदी सीखी थी. सौभाग्य से उसे वो किताबें मिल जाती है.  वो उनसे पढ़ाना शुरू करती है मगर उसे कुछ और किताबों की तलाश है. ये तलाश पूरी करने के लिए 

वो खुद एक नई किताबें लिखती है. फिर हिंदी सिखाने के लिए इंटरनेट का प्रयोग करती है और इस माध्यम से न सिर्फ अपने शहर के आसपास रहने वाले लोगों को बल्कि दुनिया के कुछ और देशों के लोगों को भी हिन्दी सिखाती है.वो अपने देश की उत्कृष्ट कविताओं का हिंदी में और हिंदी की रचनाओं का अपने देश की भाषा में अनुवाद करती है और इतना होने के बाद भी भारत आकर एक बार फिर से हिंदी में उच्च- शिक्षा हासिल करना चाहती है ताकि अपनी हिंदी और सुधार सके और हिंदी को और आगे बढ़ा सके.

ये कहानी बालीवुड की किसी फिल्म की कहानी की तरह लगती है मगर यकीन किजीये ये फ़िल्मी कहानी नहीं है बल्कि बेलारूस की एक युवती के हिंदी से जुड़ाव की सच्ची कहानी है.  क्या आप हिंदी की इस अदभूत साधिका के बारे में कुछ और जानना चाहते है? क्या आप हिंदी के प्रति उनके समर्पण की ये कहानी पढना चाहते है ? यदि हाँ तो तो उन्हीके शब्दों में हिन्दी से लगाव की  इस कहानी का पहले भाग के लिए  यहाँ , दूसरे भाग के लिए यहाँ और तीसरे भाग के लिए यहाँ चटका लगाए.

सुबोध खंडेलवाल

 


प्रकाशन दिनांक : 26-02-2012
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