हिंदी जगत

भविष्य दृष्टा की तरह होते है विज्ञान कथाकार

"कितना अच्छा हो यदि बच्चों को किस्से- कहानियों के माध्यम से विज्ञान के रहस्य समझाए जाए और बड़ों को भी कुछ इसी तरह से विज्ञान से जोडा जाए. इस दिशा में लखनऊ में एक अच्छी पहल हुई.हिन्दी में विज्ञान लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए तस्लीम,विज्ञान-प्रसार और नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया ने एक कदम उठाया.इन संस्थाओं ने यहाँ विज्ञान कथा लेखन पर कार्यशाला आयोजित की.प्रस्तुत है इसकी एक रिपोर्ट "

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दो दिवसीय कार्यशाला का उद्देश्य वैज्ञानिक लेखन के प्रति रूचि जगाना था.लखनऊ के नेशनल पी०जी कॉलेज में हुई इस कार्यशाला में विद्यार्थियों के अलावा बड़ी संख्या में अन्य लोग भी उपस्थित थे.प्रथम सत्र को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित अंग्रेजी के विज्ञान-कथाकार श्री अनिल मेनन,सुप्रसिद्ध विज्ञान-कथाकार श्री देवेन्द्र मेवाड़ी,श्री हेमंत कुमार और डा. जाकिर अली रजनीश ने संबोधित किया. सत्र का संचालन डॉ अरविन्द मिश्र ने किया.इस अवसर पर नेशनल बुक ट्रस्ट के सहायक संपादक श्री पंकज चतुर्वेदी भी उपस्थित थे.

श्री मेवाड़ी ने श्रोताओं को साइंस-फिक्शन  के इतिहास से परिचित करवाया.उन्होंने कहा कि चीन ने अभी सन 2002 में अपने ‘साइंस-फिक्शन’ लेखन की शताब्दी मनाई, जबकि अपने भारत में हिन्दी ‘साइंस-फिक्शन’ लेखन का इतिहास सौ वर्षों से भी पुराना है.राहुल सांकृत्यायन,हरिवंश राय बच्चन और गुरुवर रविन्द्र नाथ ठाकुर जैसे साहित्यकारों ने भी इस विषय पर लेखन किया है.श्री हेमंत कुमार ने अपने उद्बोधन में युवा कथाकारों को विज्ञान-कथा लिखने के मूल तत्व समझाए.कार्यशाला के संयोजक श्री जाकिर अली रजनीश ने कहा कि विज्ञान-कथा-लेखन ऐसी विशिष्ट विधा है जिसमें  भविष्य आकने की क्षमता है.विज्ञान कथा लेखकों ने कई वैज्ञानिक अविष्कारों की कल्पना इनके होने के सालों पहले अपने लेखन में कर दी थी. इस तरह वैज्ञानिक लेखन भविष्य में झांकने की दृष्टि देता है.

सत्र के मुख्य वक्ता श्री अनिल मेनन ने अपने अनुभव प्रतिभागियों के साथ बांटे. उन्होंने बताया कि कि किस तरह वे वैज्ञानिक लेखन की तरफ मुड़े और उसमें इतनी प्रसिद्धी प्राप्त की. श्री मेनन ने इस कार्यशाला की भरपूर सराहना की और कहा कि इस तरह की कार्यशाला पूरे देश में समय-समय पर होनी चाहिए और इसकी समयावधि कम से कम एक सप्ताह की होनी चाहिए ताकि  प्रतिभागियों को सीखने का पूरा मौका मिल सके. सत्र की अध्यक्षता डा. सी एम नौटियाल ने की. उन्होंने उन्होंने “फिक्शन” और “फेंतासी” में भी अंतर बताया और कहा कि ‘विज्ञान-कथा’ में फेंतासी नहीं बल्कि साइंस फिक्शन होना चाहिए.

( तस्लीम में डा. जाकिर अली रजनीश की रिपोर्ट पर आधारित. मूल रिपोर्ट यहाँ पढ़ी जा सकती है.) 

 


प्रकाशन दिनांक : 29-12-2011
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