हिंदी जगत

चेतन भाई गुलज़ार साहब ने भी आपको कुछ समझाया था... याद है ??

"हिन्दी के आँगन को टेढ़ा बताने वाले अंग्रेजी के स्वनामधन्य लेखक चेतन भगत को इस साल की शुरुआत में गुलज़ार साहब ने नसीहत दी थी.उन्होंने भी लेखक महोदय को ये सलाह दी थी कि जिस चीज़ के बारे में पता न हो, उसके बारे में कुछ भी बोलना उचित नहीं है. उनके हिन्दी के बारे में उनके द्वारा कही गई बाकि बातों के जवाब के पहले आइए इस घटना पर एक नज़र डालते है."

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मुंबई में एक समारोह के दौरान गुलज़ार साहब और चेतन भगत साथ बैठे थे. चेतन को सभी अतिथियों का स्वागत भी करना था और समारोह का संचालन भी.गुलज़ार साहब  का परिचय कराते हुए चेतन ने कहा, मुझे गुलज़ार साहब द्वारा लिखा गीत -कजरारे-कजरारे बेहद पसंद है.यह बेहतरीन कविता का एक नमूना है.  चेतन का ये कहने का ढंग कुछ ऐसा था कि मानो वो गुलज़ार को प्रमाण-पत्र दे रहे हो. ये बात गुलज़ार साहब को चुभ गई. चेतन बोल ही रहे थे कि उन्होंने इशारा कर अपने लिए एक माइक बुलवाया.

अपने हाथ में माइक लेकर खचाखच भरे हॉल में उन्होंने कहा - चेतन, मुझे यह बात बेहद अच्छी लगी. मैं ख़ुश हूं कि आप जैसे महान लेखक को कजरारे-कजरारे गीत अच्छा लगा, लेकिन मुझे नहीं लगता है कि आप जिस कविता की बात कर रहे हैं, उसे आप समझ भी पाए हैं ? अगर आपको लगता है कि आपने उस कविता को समझा है तो मैं आपके लिए उसकी दो लाइनें गाकर सुनाता हूं, आप भरे हॉल में उसका अर्थ बता दीजिए.

गुलज़ार यहीं पर नहीं रुके.उन्होंने कजरारे-कजरारे गीत की दो पंक्तियाँ - तेरी बातों में किमाम  की ख़ुशबू है, तेरा आना भी गर्मियों की लू है. इसके  बाद चेतन की तऱफ मुख़ातिब होकर उन्होंने पूछा कि इसका अर्थ

बताइए. अब चेतन को काटो तो ख़ून नहीं. गुलज़ार के वार से सन्न रह गए चेतन बगलें झांकने लगे. गुलज़ार ने भरी सभा में उन्हें नसीहत देते हुए कहा , जिस चीज़ के बारे में पता न हो, उसके बारे में कुछ बोलना ठीक नहीं है. जिसके बारे में जानते हो, उसी के बारे में बोलो. हाथ में माइक लिए पोडियम पर खड़े चेतन की स्थिति का अंदाज़ आप लगा सकते हैं. गुलज़ार ने चेतन की ठसक और हेकड़ी चंद पलों में हवा कर दी.

ये पढकर मुझे लगा था कि गुलज़ार साहब की इस नसीहत के बाद इनका बडबोलापन कम हुआ होगा लेकिन हुआ इसका उलटा. अंग्रेजी से हमें कोई बैर नहीं है लेकिन (सिर्फ एक नहीं बल्कि अंग्रेजी के जितने अंधे भगत है) जो ये मानते है कि हिन्दी में किस्से नहीं कहे जा सकते, हिन्दी में वैसा ह्यूमर नहीं है उन्हें ये बताना ज़रुरी है कि लगभग १५० साल पहले बाबू देवकीनंदन खत्री नामक एक लेखक हुए थे. सिर्फ उनके लिखे उपन्यासों को पढने के लिए उस समय सैकड़ों विदेशियों  ने हिन्दी सीखी थी. हैरानी की बात ये है कि कुछ भारतीय लोग अभी तक न तो सीख पाए न  समझ पाए.

बहुत से लोगों ने चेतन को नज़रअंदाज करने की बात कही है. हम उन्हें बिलकुल भी भाव नहीं दे रहे मगर वो और उनके समान अंग्रेजी के जितने भी अंधभक्त है -जो गाहे-बगाहे हिन्दी की क्षमता पर सवाल उठाते है. उन सबको जवाब देना बेहद ज़रुरी है. क्योंकि मीडिया की अति सक्रियता के इस दौर में चुप बैठने को कमजोरी का प्रतीक माना जाता है. तो उनकी कुछ बातों का जवाब अभी भी बाकि है, आप बताइये आप क्या सोचते है??

इस किस्से को लेकर श्री अनंत विजय द्वारा चौथी दुनिया समाचार पत्र की साइट पर लिखा पूरा लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है. चेतन के बयान पर हिन्दी होम पेज पर पहला लेख - चेतन भाई हिन्दी नहीं आपकी हिन्दी कमज़ोर है  यहाँ है.

- सुबोध खंडेलवाल

 


प्रकाशन दिनांक : 27-10-2011
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