हिंदी गौरव

कुछ अलग थे निर्मल वर्मा

"२५ अक्टूबर. आज हिन्दी के अनूठे साहित्यकार श्री निर्मल वर्मा की पुण्यतिथि है. निर्मलजी अप्रतिम लेखक थे मगर वे अपनी विद्वत्ता या प्रतिभा के बोझ तले दबे नहीं थे. उनके चेहरे पर किसी बच्चे की तरह मासूमियत झलकती थी. उनकी आवाज में ऐसा गहरापन था कि उनसे बात करो तो लगता था बस सुनते ही जाओ.प्रस्तुत है उन पर लिखा एक लेख जो लाइव हिन्दुस्तान से साभार लिया गया है. "

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निर्मल वर्मा ने हिंदी साहित्य में एक नई ताजगी पैदा की. उनकी भाषा लोगों को आकर्षित करती थी.वे  साहित्यकारों की जमात में अलग नजर आते थे.हिंदी में छोटी कहानियों के जरिए नई कहानी आंदोलन में निर्मल वर्मा की भूमिका अग्रणी रही. उनके प्रयासों के चलते हिंदी साहित्य में छोटी कहानियों का चलन तेजी से शुरू हुआ, जो आज भी कायम है.

साहित्यकार प्रेम जनमेजय कहते हैं कि निर्मल वर्मा ने हिंदी साहित्य में एक नई ताजगी पैदा की. उनकी भाषा लोगों को आकर्षित करती थी. दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफन कॉलेज से इतिहास में एमए करने वाले निर्मल वर्मा बापू से काफी प्रभावित थे मगर  दिलचस्प बात ये है  कि बापू से प्रभावित होने के बाद भी वे  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य थे.हालांकि 1956 में सोवियत संघ के हंगरी पर हमला करने के बाद उनका वामपंथ से मोहभंग हुआ और उन्होंने पार्टी छोड़ दी.

वर्मा ने हिंदी साहित्य में बतौर कहानीकार, उपन्यासकार और अनुवादक अपनी अमिट छाप छोड़ी. उनकी रचनाओं में  परिवर्तन की झलक दिखती थी. वर्मा ने अपने जीवन के 10 साल चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में बिताए.यहीं पर उन्होंने कई वैश्विक रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया.उनकी कुछ प्रमुख रचनाएं परिंदे, लाल टीन की छत, रात का रिपोर्टर और बीच बहस में प्रमुख हैं.

जनमेजय कहते है विदेश में रहते हुए भी उन्होंने हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए पूरी कोशिश की. सबसे बड़ी बात यह है कि वह हिंदी साहित्यकारों की गुटबाजी से अलग थे.हिंदी साहित्य में अमूल्य योगदान के लिए वर्मा को वर्ष 1999 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया. वर्ष 2002 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया.

सूचना -ये लेख लाइव हिन्दुस्तान डॉट काम से साभार लिया गया है. इसका मूल पाठ लाइव हिन्दुस्तान की साइट पर यहाँ पढ़ा जा सकता है.


प्रकाशन दिनांक : 24-10-2011
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