हिंदी जगत

ऑस्ट्रेलिया के हिन्दी भाषियों को सलाम

"ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले हिन्दी भाषियों ने एक बड़ी सफलता हासिल की है.अपने व्यक्तिगत और सामुदायिक प्रयासों से इन्होने विक्टोरिया सरकार को हिन्दी का महत्व समझाकर हिन्दी को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए एक बड़ी पहल की है ."

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आस्ट्रेलिया राष्ट्रीय पाठ्यक्रम प्राधिकरण - जिसे अकरा भी कहा जाता है -  वहाँ के स्कूलों में राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का निर्धारण करती है.इस संस्था ने जनवरी २०११ में अंग्रेजी के अलावा दूसरी प्राथमिकता वाली ग्यारह अन्य भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने की घोषणा की थी.इसमें चीनी,इटेलियन, कोरियन. जापानी,फ्रेंच, जर्मन, अरबी, ग्रीक स्पैनिश और वियतनामी भाषाएं तो थी मगर हिन्दी को छोड दिया गया था. 

इस डाक्यूमेंट की घोषणा के बाद से ही आस्ट्रेलिया में रहने वाले कुछ भारतीयों ने हिन्दी को राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करवाने के लिए कमर कस ली थी.सिडनी में बाल- भारती  नामक स्कूल की संस्थापक माला मेहता, आस्ट्रेलिया के हिन्दी शिक्षा संघ के संस्थापक डा. दिनेश श्रीवास्तव,संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व सलाहकार डा. कुंवर राज सिंह ने इसके लिए पहल की.धीरे- धीरे कई संस्थाए और संगठन इस मुहिम में जुट गए.

पाठ्यक्रम में हिन्दी शामिल करने के लिए अकरा को एक तर्कसंगत ड्राफ्ट भेजना ज़रुरी था.हिन्दू कौंसिल की तरफ से संजीव बाकरी और विजय सिंघल ने ये काम किया तो दूसरी तरफ आस्ट्रेलियन हिन्दी कमेटी ने भी अकरा को एक विस्तृत पत्र लिखकर ये समझाया कि हिन्दी उन सभी मापदंडों पर खरी उतरती है जिसके आधार पर ११ भाषाओं को पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है.

हिन्दी निकेतन ने विक्टोरिया के फेडरेशन ऑफ इन्डियन एसोसिएशन और भारतीय उच्चायोग के साथ मिलकर इस मामले में एक सभा आयोजित की तो यूनाईटेड इन्डियन एसोसिशन ने भी अकरा के इस फैसले का विरोध किया. हिन्दी समाज, सिडनी और साहित्य संध्या, मेलबर्न के साथ-साथ हिन्दी-गौरव जैसे हिन्दी माध्यम भी इस मामले में हिन्दी की आवाज बुलंद कर रहे थे.अपने अंगरेजी ब्लॉग के माध्यम से यदु सिंह नेभी हिन्दी के लिए आवाज उठाई .कुछ हिन्दी प्रेमियों ने इसके लिए एक आनलाइन पिटीशन भी लगाई जिसके माध्यम से चार सौ से भी ज़्यादा लोगों ने हिन्दी के लिए आवाज बुलंद की. 

जून के तीसरे सप्ताह में सामुदायिक कार्यकर्ता मनोज कुमार  के प्रयास से डा. दिनेश श्रीवास्तव, पत्रकार रशीद सुल्तान, साउथ एशिया टाइम्स के संपादक श्री नीरज नंदा के एक दल ने इस मामले में सांसद  लौरा स्मिथ के साथ बैठक  की. इस प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें एक लिखित प्रतिवेदन सौपा और इस सम्बन्ध में विक्टोरिया की पार्लियामेंट में एक एमपी द्वारा दिए गए भाषण की प्रति भी दी.

इन सबकी कोशिशे अब रंग लाने  लगी है. विक्टोरिया सरकार ने इन सबके द्वारा दिए गए डाक्यूमेंट्स अकरा को देकर उससे ये जवाब माँगा कि हिन्दी की उपेक्षा क्यों की गई  और ये भी कहा कि हिन्दी को भी पाठ्यक्रम में जोड़ा जाए.अकरा कुछ समय बाद इस पर निर्णय लेगा और उम्मीद है कि उसका फैसला हिन्दी के हक में ही होगा.

यदि आस्ट्रेलिया का हिन्दी भाषी समाज इस मकसद के लिए मिलकर काम नहीं करता तो शायद ये मुकाम हासिल नहीं होता.  मुझे लगता है इस उपलब्धि के लिए  ऑस्ट्रेलिया के हिन्दी भाषियों को सलाम करना चाहिए. इस बारे में आप क्या सोचते है ? आप यदि आप मुझसे सहमत है तो भी और नहीं है तो भी अपनी राय व्यक्त करें.


प्रकाशन दिनांक : 01-07-2011
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