वैश्विक अवसर

‘’ निकृष्ट कहे गए कर्म सोने की खदान


‘’ निकृष्ट कहे गए कर्म सोने की खदान “



कर्म और कर्म के प्रकार , किसी ने कहा है ‘’ विहित कर्म से विमुख का सर्वनाश तय है ‘’ बहुत अधिक समय नहीं हुआ जब कुछ कार्यों को निकृष्ट कहा गया और उनके कर्ता को तदनुसार लक्षित किया गया , मात्र 20 वर्षों में उन्ही निकृष्ट कर्मों का कर्ता आज धनवान हो कर सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर गया |



विहित कर्म, जिसमे मै दक्ष हूँ कैसे मुझे सम्मान नहीं दिलवाएगा ?



मेरा विहित कर्म जब किसी को ख़ुशी दे तो तय है की वो मुझे सम्मान ही दिलवाएगा परन्तु इसके उल्टे प्रचार-प्रसार ने देश के जन मानस की दिशा-दशा दोनों बदल कर काफी हद तक परावलम्बी बनने की एक मजबूत आधारशिला रख दी और स्वावलंबी जन-मानस को मानसिक दासता में जकड़ दिया | आज वही समाधान स्वयं में समस्या बन विकराल रूप में सामने खड़ा है |



प्रत्येक वह कर्म जो इंसानी जिंदगी को सहूलियत दे निकृष्ट कैसे हो सकता है ?



इस बात को स्थापित करने के बजाय उक्त कर्म के कर्ता को निकृष्ट सिद्ध किया जाता रहा और आज उसी निकृष्ट कर्म के करोड़ों के ठेके दिए जा रहे हैं जिसे करने में समाज के किसी वर्ग को कोई हीन भावना महसूस नहीं होती क्योंकि रोजगार प्राथमिकता जो बनाता गया |



श्री अरविन्द घोष की पुस्तक ‘’ मानव-एकता का आदर्श “ के पहले के पन्नों पर ‘’ पूर्ण-व्यक्ति’’ व ‘’ पूर्ण-समाज’’ पर ही अटक कर रह गया हूँ सोचता हूँ तो एक ही सवाल सामने है “ कर्म को निकृष्ट सिद्ध कर के मानव को निकृष्ट ’’ सिद्ध क्यों किया गया जो की बुनियादी रूप से गलत बात है | श्री अरविन्द घोष को ध्यान में रखते हुए यदि पूर्ण-व्यक्ति की परिभाषा से उसके द्वारा किये प्रत्येक सकारात्मक कर्म को यदि श्रेष्ठ सिद्ध किया जाता तो एक कालजई समाधान मिलता और वर्ग-संघर्ष कब का समाप्त हो गया होता और ना ही किसी वर्ग में हीन भावना का विकास ही हुआ होता | व्यक्ति का समर्पण उसके कार्य को सफलता देता है जो उसे श्रेष्ठ साबित करता है | आज वही फेंका हुआ कर्म दूसरे इंसान ही तो कर रहे हैं और वे श्रेष्ठ हैं पहले इसी कर्म का कर्ता निकृष्ट कहा गया |



क्या कहीं कोई भयंकर भूल हुई है नागरिकों के आत्मबल के निर्माण में यदि हाँ तो कीमत तो चुकानी है और जो शायद चुकाई भी जा रही है | बात व्यक्ति को स्वयं में सम्पूर्ण और सक्षम सिद्ध करने की होती है ना कि कर्म से विमुखता का रास्ता दिखा कर उसके सर्वनाश का मार्ग प्रशस्त कर एक दीर्घकालिक समस्या को जन्म देने की |



पूर्वाग्रह से ग्रस्त लेख की संज्ञा दी जा सकती है इन पंक्तिओं को परन्तु एक बात अवश्य ध्यान दीजिये की कर्म वही है आज का कर्ता धनवान है पर 20 वर्ष पहले इसी कर्म का करता गरीब हुआ करता था , पहले इन्ही कर्मो के सम्पादन में सम्मान नहीं था परन्तु आज यह स्वावलंबन की परिभाषा में समाहित है और प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति बिना किसी हीन भावना के ख़ुशी से कर रहा है |


योगदान : Abhay Kumar Gupta
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