संसाधन गीत,कविता,गज़ल

मत बनो सजन यूँ निर्मोही

"गीत,गज़ल और कविता के इस मंच पर आज प्रस्तुत है अंशु जी का श्रृंगार गीत.ये गीत उन्होंने काफी पहले हिन्दी होम पेज पर भेजा था,एक लंबे अरसे के बाद आज इसे प्रकाशित करने के लिए उनसे क्षमाप्रार्थी है.इसे ज़रूर पढ़े ये आपके भी मन को छू लेगा... "

hindi poetess anshu tripathi shringar geet pranay parinay lajja shaiyaa
मत बनो सजन यूँ निर्मोही,
प्रिय अभी शेष है निशा सकल|
धड़कन चपला हुई अभी,
अभी मुखरित हो पायी है पायल||
कुंतल घन रूपी देख तुम्हे
गजरे को तज अब लहराते|
निज संग तुमको लस सुरभि से
मन आज तुम्हारा भरमाते||

सकुची है वाणी नयनों की परिधि में बन कोमल लज्जा|
लोहित मुखड़ा नत है अब तक स्मित है अधरों की सज्जा||
दृग-मृग चंचल अठखेली रच तुमको उद्वेलित कर जाते|
इस तमा-प्रहर तुम ठहर सजन,जीवन में नवरंग भर जाते||

हुई शिथिल निशा नयी दुल्हन सी अम्बर की मादक बाँहों में|
रजनीश चन्द्रिका अंग गहे बढ़ चले प्रणय की राहों में||
रस-सिक्त छुअन से रिक्त हृदय में प्रेम-सुधा तुम बरसाते|
अपने अधरों के मधुरस से मेरी तृष्णा को भरमाते||

चम्पा की लरजी डाल झुकी शैय्या पर बन कर झूमर सी,
सौरभमय पुहुप टंके तन पर हुई मैं रतनारी चूनर सी||
पुलकित रोमों में मुखरित सुख,आलम्भ तुम्हारे कर जाते|
अनुतप्त श्वसन उन्मत्त नयन आतुर्य मनस में भर जाते||

तन पर व्रीड़ा का अंगराग इतरेतर भुज गलहार हुए|
मन रम तुम संग गाये विहाग,उध्वत कपोल अंगार हुए||
कटि, नाभि,नयन,उर,अधर विह्वल,अभिलाष प्रखर,चितवन बेकल||
मत बनो सजन यूँ निर्मोही, प्रिय अभी शेष है निशा सकल||

कठिन शब्द-
इतरेतर-परस्पर
व्रीड़ा-लज्जा
अंगराग-उबटन
विह्वल-बेचैन
पुहुप-फूल
आलम्भ-आगोश
रजनीश-चन्द्रमा
चन्द्रिका-चाँदनी
लोहित मुखड़ा-शर्म से लाल मुख
आतुर्य-हड़बड़ी,बेचैनी
तमा-प्रहर –रात का समय
कुंतल-केश
                                           अंशु रत्नेश त्रिपाठी
 

 

योगदान : अंशु रत्नेश त्रिपा
प्रकाशन दिनांक : 14-05-2013
print

नवीनतम लेख

a summer camp was organised for teaching hindi in minsk city of belarus by alesia.
BOOK WRITER, POEM, POET, SUBODH