हिंदी जगत

ब्रिटेन में हिन्दी के भविष्य की कोई चिंता नहीं, चिंता भारत की है

"पहले विदेशों में रहने वाले भारतीय अपनी नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोडने के लिए चिंतित रहते थे मगर अब वो भारत में हिन्दी को लेकर चिंतित है.ब्रिटेन की संसद में पिछले दिनों हुए सत्रहवें इंदु शर्मा कथा सम्मान समारोह में ये बात खास तौर पर उभर कर आई. "

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इस समारोह में पटना के पत्रकार विकास कुमार झा को उनके उपन्यास मैकलुस्कीगंज और नीना पॉल को उनके उपन्यास तलाश  के लिए पद्मानंद साहित्य सम्मान से अलंकृत किया गया था. इस समारोह को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने एक तरफ हिन्दी के वैश्विक विस्तार को लेकत प्रसन्नता व्यक्त की तो दूसरी तरफ वे  भारत में हिन्दी की स्थिति और हिन्दी के प्रति युवाओं के नज़रिए से चिन्तित नज़र आये.

कथा यूके के नव-निर्वाचित अध्यक्ष और बी.बी.सी. रेडियों में हिन्दी एवं तमिल विभागों के पूर्व प्रमुख श्री कैलाश बुधवार ने कहा कि उन्हें ब्रिटेन में हिन्दी के भविष्य की इतनी चिंता नहीं जितनी कि भारत की युवा पीढ़ी को लेकर है. उन्होंने कहा कि भाषा एक दीये की तरह है.कथा यूके  ब्रिटेन में हिन्दी का दीया जलाए हुए है और मुझे उम्मीद है कि इसकी रौशनी ब्रिटेन की संसद के माध्यम से पूरी दुनिया में फैलेगी.

पिछले सत्रह वर्षों से इस सम्मान के माध्यम से ब्रिटेन में हिन्दी की अलख जगाने वाले कथा यूके के महासचिव तेजेन्द्र शर्मा ने कहा कि ब्रिटेन की युवा पीढ़ी को हिन्दी की ओर आकर्षित करने के लिए वे शैलेन्द्र और साहिर लुधियानवी की रचनाओं का प्रयोग कर रहें है. उन्होंने बताया कि वो इन पर बनाए गए अपने पॉवर पॉइन्ट प्रेजेन्टेशन लेकर ब्रिटेन के भिन्न भिन्न शहरों में लेकर जाएंगे. उन्होंने भी इस बात पर  चिन्ता जताई कि भारत में युवा पीढ़ी हिन्दी साहित्य से दूर होती दिखाई  दे रही है.


प्रकाशन दिनांक : 30-06-2011
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