हिंदी जगत

हम कैसे जिये


हम इस दुनिय मे कैसे जिये, 

रात जैसे अंधेरे मे हम कैसे चले !

हम आगे तो है साफ लेकिन,

पिछे की बुराईयों को कैसे मले!

लोग तो अब न जाने, 

क्या-क्या कहने लगे !                                                                

आखो से अब आसु,

बहने लगे !

लोगो कि चंद बाते पुकारे मुझे,

पर ये कटु जहर हम सहने लगे !

लोग कहते गये और हम सहते गये,

और जिंदगी की ये जंग लङते गये !


योगदान : ऋषभ शुक्ला
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