हिंदी गौरव

भारत का संविधान 26 जनवरी 1950


 



      भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को देश की जनता द्वारा बनाया जाकर स्वयं को समर्पित किया गया। भारत का संविधान उसके निर्माताओं के आदर्शो, सपनो तथा मूल्यों का दर्पण ही नहीं है, बल्कि स्वाधीनता के नेताओं की भावना, उनकी आकांक्षा व समृद्ध राष्ट्र की संकल्पना का द्योतक भी है। संवैधानिक विधि में मूल मानव अधिकारों और राज्य व नागरिकों के परस्पर सम्बन्धों पर सर्वाधिक बल दिया गया है।


     मै आज अजमेर से संविधान बहाली मुहीम प्रारम्भ करने की घोषणा कर रहा हूं। भारत के संविधान के विनाश में लगी देश व दुनिया की षड़यन्त्रकारी ताकतों के विरूद्ध मेरा यह अभियान देश में व्याप्त अराजकता को रोकने में सहायक होगा। संवैधानिक विधि को प्रभावी ढंग से लागु किया जायगा तो देश के नागरिक का शान्ति व सुरक्षा का अधिकार संरक्षित रहेगा। गत साठ वर्षों से संवैधानिक अधिकारों के प्रति गम्भीरता नहीं बरती गयी अतः संविधान की रक्षा के लिए यह अभियान सार्थक सिद्ध होगा। मैं संविधान बहाली मुहीम के अन्तर्गत सर्वप्रथम संविधान के अनुच्छेद 18 पर देश की जनता का ध्यान आकृष्ट कर रहा हूं।


     संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 18 नैतिकता व चरित्र निर्माण की पाठशाला है। अनुच्छेद 18 (2) में देश के नागरिक को विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार करने पर प्रतिषेध है। इस धारा से देश के व्यक्ति को नैतिक मूल्य बनाये रखने की प्रेरणा मिलती है क्यों कि स्वाधीनता के नेताओं की भावना थी कि विदेशी पुरष्कार प्राप्त करके नागरिक उस विचारधारा का पोषक बनेगा तथा दुरूपयोग की सम्भावना अधिक बनी रहेगी। संविधान निर्माता यह भी जानते थे कि अवार्ड देकर विदेशी राज्य  भारतीय नागरिक के नैतिक मूल्य खरीद लेंगे और मनुष्य के पास नैतिकता के अभाव में कुछ भी शेष नहीं बचेगा।


     इंग्लेण्ड से 1994 में एश्वर्या राय को मिला विश्व सुन्दरी अवार्ड व उसके बाद लगातार भारत की तीन और विश्व सुन्दरियों डायना हेडन (1997), युक्ता मुखी (1999), प्रियंका चौपड़ा (2000) द्वारा खिताब प्राप्त करना असंवैधानिक है और उन्होने उपाधियां प्राप्त कर न केवल कार्पोरेट घरानो की बहुत बड़ी मदद की बल्कि पूरे देश को बाजारवाद की भेंट चढ़ा दिया।


     भारत के प्रमुख संविधान विशेषज्ञ श्री सुभाष कश्यप ने भी इसी तरह सेन फ्रान्सिस्को से ‘संवैधानिक विधि’ पर विदेशी उपाधि प्राप्त कर संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण किया।


     देश को नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले श्री अरविन्द केजरीवाल ने सन् 2006 में फिलीपीन्स राज्य से 50,000 अमरीकी डालर का रेमन मेग्सेसे अवार्ड प्राप्त कर संवैधानिक मर्यादाओं को ध्वस्त किया। इसी तरह मैग्सेसे अवार्ड प्राप्त कर किरण बेदी व अरूणा रॉय भी असंवैधानिक कृत्य की भागीदार बनी।


     संविधान लागू होने के बाद विश्व के सर्वोच्च तथा नो लाख चालीस हजार अमरीकी डालर की सर्वाधिक पुरष्कार राशि वाला अन्तर्राष्ट्रीय नोबल पुरष्कार भारत के डा. अमृत्य सेन व मदर टेरेसा सहित अन्य लोगों ने प्राप्त कर असंवैधानिक कुत्य किया है। अनुच्छेद 18 (1) स्वयं ही राज्य पर किसी भी नागरिक को सेना या विद्या के क्षैत्र के अतिरिक्त कोई भी उपाधि देने को प्रतिषेध करता है। जब कि संविधान लागु होने के चार वर्ष बाद से ही भारत रत्न और पद्म अवार्ड भारत सरकार द्वारा असंवैधानिक रूप से जारी कर दिये गये। विचित्र 


बात यह है कि स्वयं संविधान निर्मात्री सभा के अध्यक्ष व तत्कालीन महामहीम राष्ट्रपति महोदय श्री राजेन्द्र प्रसाद जी ने ये अवार्ड जारी किये।


     भारत रत्न अवार्ड से स्वयं को विभुषित करने वालों में तत्कालीन राष्ट्रपतियों व प्रधानमंत्रीगण के नाम है।  भारत रत्न की उपाधि प्राप्त करने वालों में प्रमुख नाम राष्ट्रपति रहे डा. राजेन्द्र प्रसाद, डा. जाकिर हुसैन, वी.वी. गिरी तथा प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू, राजीव गांधी (मरणोपरान्त) प्रमुख है। विश्वनाथ प्रतापसिंह ने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में स्वयं संविधान निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर को ही मरणोपरान्त यह उपाधि प्रदान कर दी जिन्होंने इन उपाधियों को संविधान में प्रतिषेध किया।


     इन सरकारी उपाधियों का मनामाना व असंवैधानिक उपयोग करने के लिए भारत सरकार ने भारत रत्न के प्रावधानों में चुनिन्दा श्रेणियों को भी सन् 2011 मे समाप्त कर दिया और क्रिकेट खिलाड़ी श्री सचिन तेन्दुलकर को भारत रत्न देने का रास्ता खोल दिया। आम जनता जिस खेल को व्यवसायिक खेल मानने लगी है तथा खेल और खिलाड़ी पर औद्योगिक प्रतिष्ठान निवेश करते है, एसे खेल के लिए खिलाड़ी को भारत रत्न के लिए पात्रता में शामिल करना असंवैधानिक ही नही बल्कि मूल अधिकारों का भी उलंघन है।


     भारत के संविधान में भाग 3 के अनुच्छेद 18 में किया गया प्रावधान


1. राज्य, सेना या विद्या संबंधी सम्मान के सिवाय और कोई उपाधि प्रदान नहीं करेगा।


2. भारत का कोई नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं करेगा।


3. कोई व्यक्ति, जो भारत का नागरिक नहीं है, राज्य के अधीन लाभ या विश्वास के किसी पद को धारण करते हुए किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।


4. राज्य के अधीन लाभ या विश्वास का पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति किसी विदेशी राज्य से या उसके अधीन किसी रूप में कोई भेंट, उपलब्धि या पद राष्ट्रपति की सहमति के बिना स्वीकार नहीं करेगा।


     इस सम्बन्ध में मेरी मांग है कि - 


1. भारत के महामहिम राष्ट्रपति महोदय संविधान के भाग 3 अनुच्छेद 18 (1) की समीक्षा करवाकर भारत रत्न सहित सभी पद्म पुरष्कारों को भविष्य में प्रतिषेध करवावें साथ ही सन् 1954 के पश्चात दी गयी सभी उपाधियां निरस्त की जाय।


2. केन्द्र सरकार द्वारा भारत के नागरिकों को अब तक विदेशीं राज्यों से प्राप्त सभी पुरष्कार उन देशों को वापस लौटाने के लिए बाध्य किया जाय। भविष्य में यदि कोई भारतीय नागरिक विदेशी अवार्ड प्राप्त करता है  और अब तक प्राप्त असंवैधानिक अवार्ड नहीं लौटाता है तो उसके लिए अपराधिक दण्ड का प्रावधान किया जाय।


   इस तरह भारत सरकार संविधान के भाग 3 अनुच्छेद 18 को प्रभावी ढंग से लागू कर देश में बढ़ रही विषमताओं को रोक पायेगी।


                                                     


                                                                                                                          


 

योगदान : Shyam Banwari
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