विश्व में हिंदी विश्व हिन्दी सम्मेलन २०१२

हिन्दी के सबसे बड़े राजदूत को भूलाया विश्व हिन्दी सम्मेलन ने

"हिन्दी को भारत की सीमाओं से निकालकर दुनिया के कोने-कोने में पहुँचाने में हिन्दी सिनेमा ने सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. यदि आज विश्व के कोने-कोने में हिन्दी के कद्रदान देखे जा सकते है तो उसका एक बड़ा कारण हिन्दी फिल्मों और गानों की लोकप्रियता है मगर हिन्दी के इस वैश्विक आयोजन में फिल्म उद्योग को भूला दिया गया. "

hindi films

 किसी ज़माने में बाबू देवकीनंदन खत्री की किताब चन्द्रकान्ता संतति ने हिन्दी के लिए जो भूमिका निभाई थी कमोबेश वही भूमिका अब हिन्दी सिनेमा निभा रहा है. उस समय कई विदेशियों ने ये किताब पढने के लिए हिन्दी सीखी थी और आज के इस दौर में चीन से लेकर जापान, अमेरिका से  अफ्रीका, आर्मेनिया से साइबेरिया और तुर्की से लेकर ईरान तक दुनिया भर में ऐसे हज़ारों लोग है जो फिल्मों के कारण हिन्दी सीख रहे है.

हिन्दी सिनेमा अनजाने में ही (अनजाने में इसलिए क्योंकि शायद किसी भी फिल्मकार का उद्देश्य हिन्दी का प्रसार करना नहीं था) हिन्दी भाषा का सबसे बड़ा राजदूत बनाकर उभरा है मगर हैरानी की बात ये है कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में हिन्दी के इस राजदूत को पूरी तरह से नज़रन्दाज कर दिया गया और वो भी तब जब इस सम्मेलन का एक पूरा सत्र हिन्दी फिल्मों के ही नाम पर था.हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में बालीवुड की भूमिका पर केंद्रित सत्र में बालीवुड से बोलने वाला कोई नहीं था. ये बिलकुल ऐसा ही था मानो क्रिकेट पर एक वैचारिक कार्यक्रम हो और उसमें बोलने के लिए पी एच डी करने वालों को बुला लिया जाए और वो कोच,क्रिकेटर, कमेंटेटर और क्रिकेट प्रशासक की भूमिका पर निबंध पढ़े. 

विदेश राज्यमंत्री प्रणीत कौर ने इस बारे में एक संवाद एजेंसी को बताया कि यदि फ़िल्मी सितारों को सम्मेलन में बुलाया जाता तो उनके ग्लेमर में मूल मुद्दे छुप कर रह जाते. उनकी बात एक हद तक सही भी है मगर सिनेमा का मतलब सिर्फ अभिनेता/अभिनैत्री नहीं होता. यदि सरकार को सितारों के ग्लेमर से इतना ही डर था तो फिल्म उद्योग के प्रतिभाशाली कहानीकार,गीतकार,संवाद और पटकथा लेखकों को बुलाया जा सकता था? मगर उन्हें भी नहीं पूछा गया.

हिन्दी को वैश्विक भाषा बनाने के अनुष्ठान में जुटे लोगों को ये बताना ज़रुरी है कि अनजाने में और ना चाहते हुए भी हिन्दी का जितना वैश्विक प्रसार फिल्मों से जुड़े रचनात्मक लोगों ने किया है आज के दौर के सारे विद्वान लेखक,साहित्यकार और प्राध्यापक मिलकर भी उसका एक प्रतिशत भी नहीं कर  पाए है और ना ही कर सकते है. ऐसे में यदि इन्हें बुलाकर इनके मन में हिन्दी के प्रति और आदर जगाया जाता तो शायद हिन्दी के वैश्विक विस्तार के लिए ये और बेहतर होता.

सुबोध

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प्रकाशन दिनांक : 24-09-2012
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