हिंदी गौरव

नर हो न निराश करो मन को

"आज का वातावरण कुछ ऐसा है जो सकारात्मक कार्यों में लगे लोग अक्सर निराशा की तरफ धकेलता है. ऐसे में भारत के राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्तजी की ये पंक्तियाँ आशा की नई किरण जगाती है. कल यानी ३ अगस्त को गुप्ताजी की जयन्ती भी थी ऐसे में ये पंक्तिया और अधिक सार्थक लगती है. "

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नर हो न निराश करो मन को

कुछ काम करो कुछ काम करो

जग में रहके निज नाम करो

यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो

समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो

कुछ तो उपयुक्त करो तन को

नर हो न निराश करो मन को ।



संभलो कि सुयोग न जाए चला

कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला

समझो जग को न निरा सपना

पथ आप प्रशस्त करो अपना

अखिलेश्वर है अवलम्बन को

नर हो न निराश करो मन को ।



जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ

फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ

तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो

उठके अमरत्व विधान करो

दवरूप रहो भव कानन को

नर हो न निराश करो मन को ।



निज गौरव का नित ज्ञान रहे

हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे

सब जाय अभी पर मान रहे

मरणोत्तर गुंजित गान रहे

कुछ हो न तजो निज साधन को

नर हो न निराश करो मन को ।



 



प्रकाशन दिनांक : 04-08-2012
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