हिंदी गौरव

हिंदी क्यों ? दूसरा भाग

"ये लेख बात लिखते समय मेरे मन में एक बात और आ रही है. अंग्रेज़ी, फ्रेंच या स्पेनिश भाषा के अध्यापकों से शायद ही कभी ये पूछा जाता होगा कि इन भाषाओं से आपका लगाव कब और कैसे हुआ? पर शायद ये प्रश्न हिन्दी के अध्यापको से अक्सर पूछा जाता है.-पढ़िए हिंदी के प्रेमी और विद्वान डॉ.गेनादी श्लोम्पेर द्वारा लिखे गए लेख का दूसरा भाग"

story of attachment with hindi genedy shlopmper and hindi

दरअसल अंग्रेज़ी, फ्रेंच या स्पेनी सीखने का कारण बिल्कुल स्पष्ट है.इन भाषाओं की विश्व के कई देशों में बड़ी मांग है और ये भाषाएँ लोगों को रोजी-रोटी प्रदान करती है. मुझे बहुत बाद में पता चला कि ‘हिन्दी  क्यों?’ ये प्रश्न इसलिये पूछा जाता है क्योंकि हिन्दी की स्थिति हिन्दी के अपने ही देश भारत में इतनी अनुकूल नहीं है जितनी कि दुनिया की बहुत सी दूसरी भाषाओं की होती है. अगर अपने देश भारत में हिन्दी  का इतना प्रभाव नहीं है कि वह जीविकोपार्जन का साधन बन सके, तो दूसरे देशों में उसकी क्या हालत होगी? तो एक प्रश्न ये भी है कि क्या हिन्दी अन्न-भाषा नहीं हो सकती?
मगर ये प्रश्न स्थिति का एक ही पक्ष बताता है, अब इस स्थिति का दूसरा पक्ष देखिये. मैं जहां भी रहा (और मुझे अपने जीवन में तीन देशों का नागरिक बनना नसीब हुआ है, पहले उज़बेकिस्तान, फिर रूस और अब इज़रायल) हर जगह हिन्दी ही मेरी कमाई का एकमात्र माध्यम बनी रही.
ताशकंद विश्वविद्यालय से हिन्दी/उर्दू में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के बाद अपने सपने को साकार करते हुए मै ताशकंद रेडियो के उर्दू विभाग में काम करने लगा.यहाँ मै अनुवादक के रूप में काम करता था.ये ज़िम्मेदारी मैंने चार साल निभाई. लेकिन एक कम्यूनिस्ट देश के रेडियो पर रोज़ झूठी बातों का अनुवाद करते-करते मैं थक गया था. वहाँ  कुछ ऐसा वातावरण था जिससे मेरा दम घुटता था. आखिरकार मैंने उसे छोड़ दिया और इसके बाद एक स्कूल में  अध्यापक के रूप में काम करने लगा.बस यही वो कदम था जिसने मेरी ज़िंदगी को बदल दिया.स्कूल में काम शुरू करते ही मैं समझ गया कि मेरा जीवन का लक्ष्य भाषा का अध्यापन करना है.मेरे सामने अब मेरे जीवन का लक्ष्य एकदम साफ़ हो गया था. कुछ साल तक इस स्कूल में पढाने के बाद मै मॉस्को पहुँच गया और यहाँ हिन्दी  पढ़ाने लगा और तब से लेकर आज तक यानी पिछले लगभग २५ सालों से मै हिन्दी  के अध्ययन-अध्यापन में लगा हुआ हूँ.
भाषा और संस्कृति एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं. भाषा,संस्कृति के जीवित रहने का माध्यम भी है और उसका दर्पण भी. इसलिये जो लोग भारत की संस्कृति पर शोध कर रहे हों, उनके लिये भारतीय भाषाओं की खासकर हिन्दी की जानकारी अनिवार्य है.ठीक ऐसा ही भाषा के क्षेत्र में भी है. भारत की संस्कृति जाने बिना हिन्दी  भाषा को न तो उचित ढंग से समझा जा सकता है और ना ही पढ़ाया जा सकता है. अपना कार्य सुचारु रूप से निभाने के लिये भाषा के अध्यापक को उस भाषा से जुड़े देश की संस्कृति, इतिहास, परम्पराएं और आधुनिक जीवन का व्यापक ज्ञान होना चाहिये. हिन्दी को समझने और समझाने के लिए मैंने भारत को समझने की कोशिश शुरू की और इस मोड पर आकर शुरू हुआ हिन्दी और भारत के प्रति लगाव, अपनेपन और आत्मीयता का दौर.........

माननीय डॉ.गेनादी श्लोम्पेरके इस लेख की प्रस्तावना यहाँ तथा पहला भाग यहाँ तथा तीसरा भाग यहाँ देखा जा सकता है.

 

 


प्रकाशन दिनांक : 25-06-2012
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