संसाधन पुस्तक समीक्षा

हिन्दी नाटक पर एक नया चिंतन - मंजुल भारद्वाज- थिएटर ऑफ रेलेवेन्स

"नाटक की सार्थकता तभी है जब उसमे आम आदमी को अपनी अभिव्यक्ति दिखे और वो स्वयं उसका पात्र बन सके.इस नाट्य दर्शन को पहली बार समग्र रूप से संपादित किया है लेखक व नाटककार संजीव निगम ने. उनके प्रयासों से मंजुल भारद्वाज- थिएटर ऑफ रेलेवेन्स नामक किताब सामने आई है."

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इस पुस्तक के अधिकाँश हिस्से मंजुल भारद्वाज के अनुभवों, चिंतन और लेखन से उपजे हैं.मंजूल वो शख्स है जिन्होंने आम आदमी को हिन्दी नाटकों से जोडने के लिए नाटक की एक नई पद्धति इजाद की. इस नाट्य दर्शन में दर्शक को पहला रंगकर्मी माना गया है. उन्होंने इस दर्शन को  थिएटर ऑफ रेलेवेन्स  नाम दिया. ये किताब हिन्दी नाटकों के इसी नए दर्शन पर केंद्रित है. मंजुल ने नाटक को मनोरंजन से आगे बढ़ा कर परिवर्तन और प्रशिक्षण का माध्यम भी मंजुल ने बनाया है. उसके इन प्रयासों को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है.

इस किताब में इस नाट्य पद्धति का खुलासा भी है और  हिन्दी नाटकों से दर्शकों की दूरी को पाटने के उपायों पर चर्चा भी है.  इस पुस्तक के आने से  इस नाट्य पद्धति पर दूसरे विद्वान् भी चिंतन कर सकेंगे. पुस्तक के विभिन्न पाठों में इस पद्धति के अलग अलग पक्षों पर लिखा गया है. इसके अतिरिक्त प्रबंधन, शिक्षा, प्राकृतिक आपदा आदि परिस्थितियों में थिएटर कैसे सार्थक भूमिका निभा सकता है इसका भी विस्तार से  उल्लेख है.श्री संजीव निगम द्वारा संपादित ये किताब औरंगाबाद के रवि प्रकाशन ने प्रकाशित की है.

 

 


प्रकाशन दिनांक : 17-03-2012
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