हिंदी गौरव

हिन्दी सिखाने के लिए लिखी एक नई किताब - पढ़िए तीसरा भाग

"बेलारूस में जो लोग हिन्दी सीखना चाहते थे मैंने उन्हें खुद हिन्दी पढाने का फैसला किया. इसके लिए अखबारों में, इंटरनेट पर विभिन्न साइटों पर, पुस्तकालयों और सांस्कृतिक संस्थानों में विज्ञप्ति दी.शुरु में इसका कोई परिणाम नहीं हुआ. क्योंकि मेरी विज्ञप्तियां समाचार पत्रों में बहुत कम प्रकाशित होती थी मगर मैंने हिम्मत नहीं हारी और खूब प्रयास कर आखिरकार मिन्स्क में हिन्दी सीखने के उत्सुक कुछ लोगो को इकट्ठा कर ही लिया. "

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अभी रास्ते में और भी कठिनाइयां थी. सब से पहले अपनी कक्षा के लिए स्थान ढूँढ़ना था.मेरे छात्रों की संख्या बहुत कम थी और कोई भी संस्था इतने कम लोगों के लिए कोई कक्ष नहीं दे पा रही थी. तब मैंने अपनी कक्षा बेलारूस के राष्ट्रीय पुस्तकालय में लगाई और धीरे धीरे वही हमारा पाठशाला बन गया. मिंस्क से दूर रहने वाले लोगो को मैंने इंटरनेट द्वारा पढ़ाने का फैसला किया.जल्दी ही कई लोग मुझसे स्काइप,याहू आदि  के द्वारा हिन्दी सीखने लगे इनमे बेलारूस के अलावा अन्य देशों से(रूस, यूक्रेन, क़ज़ाख़स्तान, आर्मेनिया) के छात्र भी थे.

हिन्दी का सफर आगे बढ़ रहा था, मगर अब समस्या पाठ्यपुस्तकों की थी. मिन्स्क में अभी भी हिन्दी पढाने के लिए पुस्तकें उपलब्ध नहीं थी.मैं भारत से कुछ अच्छी किताबें लायी थी मैंने उनका उपयोग किया.मैंने अपनी पुरानी किताब और कापियाँ ढूंढी -जिनसे मैंने हिन्दी सीखी थी- मुझे रूसी प्रोफेसर ओलेग उल्त्सिफ़ेरोव द्वारा लिखी गई एक किताब मिल गई. इससे मैंने हिन्दी सीखी थी. मैं इन किताबों की प्रतियाँ करके अपने छात्रों को देती थी या उन्हें इंटरनेट से भेजती थी. इस किताब से एक ही वर्ष में छात्र हिंदी का लगभग पूरा व्याकरण सीख सकते हैं. लेकिन इसकी कुछ सीमाएं है. ये विश्वविद्यालय के छात्रों के लिए ज़्यादा उपयोगी थी नैसिखियों को इससे हिन्दी सीखाना थोड़ा मुश्किल था. 

कुछ समय  बाद मुझे एक और किताब मिली. नतालिया लाज़ारेवा  द्वारा लिखी गई ये किताब रूस में हिंदी पढ़ रहे छात्रों के लिए काफी उपयोगी है. इसमें रूसी हिंदी और हिंदी रूसी शब्दकोश  तथा रूसी-हिन्दी वार्त्तालाप-पुस्तिका तथा  दो ऑडियो सीडी भी हैं, जो भारतीय वक्ताओं द्वारा बोले जाते शब्दों और वाक्यों को स्पष्ट सुनना और खुद बोलना सिखाते हैं.

मैं इन सभी पुस्तकों से हिन्दी पढ़ा रही थी लेकिन मैं देखती थी कि पढाई वैसे नहीं हो पा रही है जैसे होना चाहिए. मुझे लग रहा था कि मेरे पास जो किताबें है वो मेरी आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकती.इसलिए मैं सोचने लगी कि मेरी अपनी पाठ्यपुस्तक क्यों न बनाऊँ.मैंने मौजूद पाठ्यपुस्तकों के आधार पर अपनी पाठ्यपुस्तक बनाने का फैसला किया,इन में कुछ परिवर्तन करके,पढ़ाई अधिक मज़ेदार, दिलचस्प और आसान करने के लिए मैंने नतालिया लाज़ारेवा की पाठ्यपुस्तक के आधार पर एक नई पुस्तक की रचना की.

मेरी पाठ्यपुस्तक में इस प्रकार के अभ्यास हैं:रिक्त स्थान को भरना,सही शब्द या अक्षर चुनना,  शब्दों को जोड़ना,अनुचित शब्द चुनना,​​तस्वीरों का तुलना,तस्वीर का वर्णन करना.तथा मैं जोड़ी में काम करने के लिए इस प्रकार के अभ्यास देती हूँ: साथी के सवालों के जवाब देना,  साथी को कुछ बताना,साथी से किसी विषय पर बात करना, आदि.मेरी पाठ्यपुस्तक में बहुत रचनात्मक तथा खेल के अभ्यास हैं,जैसे: रचना करना,वर्णन करना,वाक्य बनाना,गूढ़लेख स्पष्ट करना,चित्र अनुकूल शब्द से मिलाना, टेक्स्ट के अनुसार चित्र बनाना, आदि.इसके माध्यम से मेरे देश के छात्रों को हिन्दी सीखाना कुछ आसान हो गया है और रोचक भी...

सुश्री आलेसिया के इस लेख की प्रस्तावना, पहला और दूसरा भाग  यहाँ पढ़ा जा सकता है.

योगदान : Alesia
प्रकाशन दिनांक : 29-02-2012
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