संसाधन हिंदी साहित्य

अदम साहब की कुछ और रचनाएँ

"खेतों में हल चलाने वाले हाथ जब गज़ल लिखते है तो वहाँ भी लोगों के दिल में दर्द के बीज बोते नज़र आते है. अदम साहब की रचनाएं पढ़कर लगता है कि आज के हालात उन्होंने गज़ल के रूप में ढाल दिए है.. ....... सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है, दिल पर रख कर हाथ कहिये देश क्या आज़ाद है?..... यहाँ आप ठेठ देसी अंदाज में मंच पर इन ग़ज़लों को पढते हुए अदम साहब को देख और सुन सकते है. "

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सौ में सत्तर आदमी

फिलहाल जब नाशाद है

दिल पे रखकर हाथ कहिये 

देश क्या आजाद है

कोठियों से मुल्क के

मेयार को मत आंकिये
असली हिंदुस्तान  तो फुटपाथ पर आबाद है

और

वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है
उसी के दम से रौनक आपके बंगले में आई है

इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्‍नी का
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है

कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले
हमारा मुल्‍क इस माने में बुधुआ की लुगाई है

रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बतलाएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है

और

जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये

जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये

जल रहा है देश यह बहला रही है क़ौम को
किस तरह अश्लील है संसद की भाषा देखिये

ये और ऐसी ही कई गज़ले अदम साहब ने एक कुछ समय पहले दिल्ली के हिन्दी भवन में हुए एक कवि सम्मेलन में पढ़ी थी. एक काव्य प्रेमी के यू-ट्यूब संग्रह के माध्यम से आप इन्हें यहाँ देख सकते है.


प्रकाशन दिनांक : 28-11-2011
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