हिंदी गौरव

रवींद्र जयन्ती पर पढ़े गुरुदेव की एक अद्भुत बाल कविता

"रवींद्र नाथ ठाकुर संभवतः विश्व के एकमात्र कवि हैं जिनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया है.कवि,लेखक,साहित्यकार,संगीतकार होने के साथ-साथ वे चित्रकार भी थे.बहुत कम लोग जानते है कि उन्होंने बच्चों के लिए भी खूब रचनाएँ लिखी थी. आज उनकी जयन्ती है इस अवसर पर प्रस्तुत है विख्यात साहित्यकार श्री प्रकाश मनुजी के चिट्ठे से आभारपूर्वक ली गई गुरुदेव की ये बाल कविता. "

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प्रकाश मनु नामक अपने इस चिट्ठे श्री प्रकाश जी लिखते है -रवींद्रनाथ टैगोर एक बड़े और सही मायनों में मुकम्मल साहित्यकार थे, इसकी एक बड़ी कसौटी यह भी है कि उन्होंने बड़ा अद्भुत बाल साहित्य लिखा है. उन्होंने ऐसा बाल साहित्य रचा है जिसे यदि बड़े लोग भी उसे पढ़ें तो उन्हें अपना बचपन और बचपन की नटखट शरारतें याद आने लगे. ऐसा लगता है कि कि उन्होंने बाल-मन का कोना-कोना छान मारा है. लिहाजा उन्हें पढ़ते हुए कभी हमारे होंठों पर हंसी खेलने लगती है, कभी हम मुसकरा पड़ते हैं और कभी-कभी तो अचानक ठहाके लगाकर हँसने लगते हैं.
उनकी इस कविता को आप भी पढ़ें, क्योंकि इसे पढ़ने का अपना सुख है. बच्चे ही नहीं, शायद बड़े भी इसका आनंद ले सकते हैं, क्योंकि इस कविता को पढ़ना अपने बचपन को फिर से जी लेने के मानिंद है.

नहीं किसी को पता कहाँ मेरे राजा का राजमहल.
अगर जानते लोग, महल यह टिक पाता क्या एक पल.
इसकी दीवारें सोने की, छत सोने की धात की,
पैड़ी-पैड़ी सुंदर सीढ़ी उजले हाथी दाँत की.
इसके सतमहले कोठे पर सूयोरानी का घरबार,
सात-सात राजाओं का धन, जिनका रतन जड़ा गलहार.
महल कहाँ मेरे राजा का, तू सुन ले माँ कान में,
छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में.

सात समंदर पार वहाँ पर राजकुमारी सो रही,
इसका पता सिवा मेरे पा सकता कोई भी नहीं.
उसके हाथों में कँगने हैं, कानों में कनफूल,
लटें पलंग से लटकी लोटें, लिपट रही है धूल.
सोनछड़ी छूते ही उसकी निंदिया होगी छू-मंतर,
और हँसी से रतन झरेंगे झर-झर, झर-झर धरती पर,
राजकुमारी कहाँ सो रही, तू सुन ले माँ कान में,

छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में.
बेर नहाने की होने पर तुम सब जातीं घाट पर,
तब मैं चुपके-चुपके जाता हूँ उसी छत के ऊपर.
जिस कोने में छाँह पहुँचती, दीवारों को पार कर,
बैठा करता वहीं मगन-मन जी भर पाँव पसार कर.
संग सिर्फ मिन्नी बिल्ला होता है छत की छाँव में,
पता उसे भी है नाऊ-भैया रहता किस गाँव में.
नाऊ-टोला कहाँ, बताऊँ--तो सुन ले माँ कान में,
छत के पास जहाँ तुलसी का चौरा बना मकान में.

इस कविता का हिन्दी अनुवाद श्री युगजीत नवलपुरी ने किया है.ये कविता श्री प्रकाश मनुजी के चिट्ठे से ली गई है. बाल साहित्य के इये समर्पित उनके हिन्दी चिट्ठे पर ये कविता यहाँ  पढ़ी जा सकती है.


प्रकाशन दिनांक : 07-05-2013
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