हिंदी जगत

क्यों चुप रहते है हिन्दी के लोग ?

"कोलम्बो में भारतीय टीम का मैनेजर एक पत्रकार वार्ता में भारत के कप्तान और पत्रकारों को हिन्दी बोलने से रोकता है.सरेआम हिन्दी का अपमान होता है मगर इस अपमानजनक घटना के विरोध में कोई मुंह नहीं खोलता.धरना प्रदर्शन या आंदोलन तो छोडिये कोई भी हिन्दी भाषी व्यक्ति या संस्था क्रिकेट बोर्ड के सामने विरोध भी दर्ज नहीं करा पाती. ना तो कोई हिन्दी के विरोध के खिलाफ आवाज उठाता है और ना हिन्दी में सवाल पूछने वाले पत्रकार की पीठ थपथपाता है.क्यों मौन रहते है हिन्दी के लोग,हिन्दी की संस्थाएं और हिन्दी के समर्थक ? "

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ये बात लगभग चार दिन पुरानी है.शायद आपमें से कई लोगों ने अखबारों में पढ़ी भी होगी. बात श्रीलंका की है. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी एक पत्रकार वार्ता संबोधित कर रहे थे.सहारा समय के एक पत्रकार कपिल वशिष्ठ ने उनसे हिन्दी में एक सवाल पूछा.धोनी उसका जवाब दे ही रहे थे कि अचानक भारतीय टीम के मीडिया मैनेजर के पेट में बहुत तेज दर्द होने लगा. उनका पेट हिन्दी के कारण  दुख रहा था, उन्होंने धोनी को हिन्दी में जवाब देने से रोक दिया और कपिल को अंग्रेज़ी में सवाल पूछने की हिदायत दे दी.
यदि ये घटना हिन्दी के अलावा भारत या विश्व की किसी भी दूसरी भाषा के साथ हुई होती तो बवाल मच जाता. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के दफ्तर के सामने धरने,प्रदर्शन, आंदोलन और पुतला दहन का दौर शुरू हो गया होता. हो सकता है कि इस विरोध के चलते बोर्ड अपने इस मैनेजर को वापस बुलाकर माफी भी मांग लेता लेकिन यहाँ धरने प्रदर्शन की बात तो छोडिये किसी ने विरोध भी दर्ज नहीं कराया.
विश्व में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा के इस सार्वजनिक अपमान के बाद भी न तो हिन्दी की किसी संस्था ने  विरोध जताया न हिन्दी मीडिया ने, न हिन्दी के किसी लेखक ने इसके विरोध में बोर्ड को चिट्ठी लिखी न किसी पत्रकार ने (उस समय ज़रूर कपिल वशिष्ठ और उनके साथ के कुछ लोगों ने विरोध किया था लेकिन इस  घटना के बाद किसी ने अपना मुंह नहीं खोला). सोशल मीडिया पर हिन्दी के नारे बुलंद करने वाले लाखों- करोडो हिन्दी भाषियों ने भी इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई.
मेरा सवाल यही है ऐसा क्यों होता है ? हिन्दीभाषी लोग हिन्दी  के अपमान को इतनी आसानी से क्यों पचा जाते है ? संख्याबल,गुणवत्ता और वैज्ञानिकता के आधार पर विश्व की सबसे श्रेष्ठ भाषा को बोलने वाले लोगों में अपनी भाषा के प्रति न तो लगाव है न और अपनापन. शायद यही कारण है हिन्दी को और हिन्दी के लोगों को हाशिए पर रखा जाता है  अंग्रेजी में कहूँ तो टेकन फॉर ग्रांटेड लिया जाता है और जब तक हिन्दी भाषी समाज ऐसी घटनाओं का  विरोध नहीं करेगा तब तक इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आएगा.

सुबोध
 


प्रकाशन दिनांक : 21-09-2012
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