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बदला मौसम

"आपको भी कई बार लगता होगा कि अब मौसम बदल गया है. सिर्फ मौसम ही नहीं कई बार तो माहौल बदला हुआ सा लगता है. इसी बदले हुए परिवेश पर पढ़े युवा पत्रकार श्री सुबोध श्रीवास्तव की ये कविता, जो उन्होंने पीढ़ी का दर्द नामक अपने काव्य संग्रह से भेजी है... "

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चिडि़या
अब नहीं लाती दाना
घोंसले में छिपे
बच्चों के लिए
जो अब लगने लगे हैं
उसे पराये से।
वह सोचती है कि
बच्चे भी सोचते हैं
ऐसा ही कुछ
शायद इसीलिए
वे अब खुद चुगते हैं दाना
कुछ भी नहीं कहते उससे
और चिडि़या.
कोशिश नहीं करती
दाना उठाने की
जो बच्चों की चोंच से
गिर जाता है बार.बार घोंसले में
क्योंकि परायों के लिए
कोई कुछ नहीं करता।

योगदान : सुबोध श्रीवास्तव
प्रकाशन दिनांक : 03-10-2012
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