संसाधन गीत,कविता,गज़ल

सुबकता है अस्पताल- जो, आदमी नहीं होता.

" यदि कवि पत्रकार भी हो तो उसकी दृष्टि और भी पैनी हो जाती है. कानपुर के पत्रकार सुबोध श्रीवास्तव ऐसे ही एक कवि है.यहाँ पढ़िए उनकी एक कविता जो अस्पताल के संवेदनहीन माहौल को आपके सामने जीवंत कर देगी. "

hindi journalist subodh shrivastav kanpur poet poem on hospital
 
 
 
 
 
अस्पताल
जो, आदमी नहीं होता
मगर जीता है
आदमी सा.
 
खामोशी से देखता है
टकटकी लगाए
बरामदे में पड़े
तवे से काले
चपटे पेट वाले आदमी को
जो भूख पटाने का जुगाड़
न होते हुए भी
सोचता है-
टूटी टांग के इलाज की बात,
 
किसी बेवा की
आकाश भेदती चीख,
मैले से मासूम बच्चे के
सामने से जाती बाप की लाश,
साफ-सुथरे कमरे की खिड़की से
आवारा जानवरों को
फेंकी जाती मक्खन लगी ब्रेड,
 
देर रात-
दर्द से बिलबिलाते
मरियल से आदमी का
हाल बताने के लिए
डॉक्टर का दरवाजा खटखटाने पर
डांट खाते तीमारदार,
 
शुभचिन्तकों का जमघट देख
कुप्पा होता बीमार सेठ
और, सड़ांध के बीच
इमरजेन्सी के
खून से सने बेड पर
इलाज से पहले ही
कागज़ी खानापूरी के बीच
दम तोड़ते
अनाम युवक को..
 
फिर / उसकी लाश
टूटे रिक्शे के हवाले करते 'भगवानों 'को।
सब कुछ देखता-सुनता है
और / देर रात सोता नहीं
सुबकता है अस्पताल-
जो, आदमी नहीं होता.
 
योगदान : सुबोध श्रीवास्तव
प्रकाशन दिनांक : 06-05-2013
print

नवीनतम लेख

a summer camp was organised for teaching hindi in minsk city of belarus by alesia.
BOOK WRITER, POEM, POET, SUBODH