हिंदी गौरव

हिन्दी क्यों? तीसरा भाग

"इज़राइल के युवाओं को हिन्दी से जोडने के लिए के हिन्दी और हिब्रू के बीच संवाद का एक पुल बनाना ज़रुरी था. मैंने हिब्रू भाषा में पुस्तकें लिखकर दोनों भाषाओं के बीच एक ऐसा ही पुल बनाने की कोशिश की.१५ साल पहले जब मैंने इज़रायल में हिन्दी का अध्यापन शुरू किया था. तब पूरे इज़राइल में, मैं हिन्दी का अकेला अध्यापक था. मुझे इस बात की खुशी है कि आज इज़रायल के तीन विश्वविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है.यहाँ पढ़िए तेल अवीव विश्वविद्यालय के हिन्दी प्रमुख डा.गेनादी श्लोम्पर के लेख का तीसरा भाग "

I know soon that time will come when people will not surprised to know that i am a hindi teacher infect they will becoame zealous to know this.

फिर हिन्दी के माध्यम से मुझे भारत को जानने का मौक़ा मिला. भारत की प्रकृति,यहाँ की अनेकता और  लोगों और विचारों की विविधता के चलते भारत के प्रति मेरे दिल में एक विशेष अनुभूति उभर कर आई जिसे ज़ोरदार खिंचाव या लगाव कहा जा सकता है. भारत कों और ज़्यादा करीब से जाने और समझाने की इच्छा हुई जिसके चलते मै हिन्दी और हिन्दी भाषा की विशेषताओं को और  अधिक गहराई से समझने लगा.
इसी खिंचाव ने मुझे हिन्दी पढ़ाने के लिये हिब्रू भाषा में पाठ्य-पुस्तकें लिखने के लिये प्रेरित किया.इज़राइल के युवाओं को हिन्दी से जोडने के लिए के हिन्दी और हिब्रू के बीच संवाद का एक पुल बनाना ज़रुरी था. मैंने हिब्रू भाषा में पुस्तकें लिखकर दोनों भाषाओं के बीच एक ऐसा ही पुल बनाने की कोशिश की. यहाँ के युवाओं में हिन्दी और भारत के प्रति रुचि और जिज्ञासा जागृत करने के लिए मैंने हिब्रू भाषा में हिन्दी सीखाने के लिए पुस्तकें लिखी. लगातार प्रयास करके मैंने तीन साल के कोर्स के लिये ज़रूरी पुस्तकें तैयार की.

१५ साल पहले जब मैंने इज़रायल में हिन्दी  का अध्यापन शुरू किया था. तब पूरे इज़राइल में, मैं हिन्दी  का अकेला अध्यापक था. मुझे इस बात की खुशी है कि आज इज़रायल के तीन विश्वविद्यालयों में हिन्दी  पढ़ाई जा रही है. इज़रायल की युवा पीढ़ी में भारत और हिन्दी  के प्रति लगाव लगातार बढ रहा है. छले कई बरसों से भारत में भी हिन्दी  की हालत सुधरती दिखाई दे रही है. पिछले साल मैंने अपने कई छात्रों के साथ दिल्ली, चंडीगढ़, वाराणसी, हैदराबाद, वर्धा और मुंबई का एक लंबा सा चक्कर लगाया था. एक महीने की यात्रा के दौरान मुझे कहीं भी अंग्रेज़ी में एक भी शब्द बोलने की ज़रूरत नहीं पड़ी.मुझे लगता है कि कि वह समय दूर नहीं जब यह प्रश्न कि ‘आप हिन्दी  क्यों पढ़ाते हैं’ बेमानी हो जाएगा  और ये  जानकर कि मैं हिन्दी  का अध्यापक हूं, लोगों को आश्चर्य नहीं होगा बल्कि उन्हें मुझसे ईर्ष्या होने लगेगी.
माननीय डॉ.गेनादी श्लोम्पेरके इस लेख की प्रस्तावना यहाँ , पहला भाग यहाँ तथा दूसरा  भाग यहाँ देखा जा सकता है.


प्रकाशन दिनांक : 26-06-2012
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