संसाधन पुस्तक समीक्षा

मन को छूता केप्टन सेमंत का कविता संग्रह

"भारतीय फौज से रिटायर्ड अफसर केप्टन हरीश सेमन्त अब विख्यात कंपनी आईबीएम के साथ जुड़े हुए है.पढने-लिखने और प्रकृति से जुड़े रहने के शौक़ीन सेमन्त अपनी संवेदनाओं को कागज़ पर उकेरते है. हाल ही में उनके दो कविता संग्रह प्रकाशित हुए है.कुछ अनछुई ज़िंदगी इनमें से एक है.इस संग्रह में उन्होंने ज़िंदगी के कई अनछुए पहलुओं को अपने शब्दों और कविताओं से छूने की कोशिश की है."

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अपने आंगन की छत के नीचे खड़े होकर अपने हिस्से  में कांटे रख दूसरों को फूल देने के पीछे हरीश की कविताओं का कोई मकसद जरुर है. यह संदेह नहीं है, आशा है.खुद चक्रव्यूह में उलझे रहने के बाद भी वे उमंग की एक गेंद हवा में उछाल देते हैं. ये केप्टन हरीश सेमंत  की कविता की खूबी है. उनकी यही खूबी उनके कविता संग्रह कुछ अनछुई ज़िंदगी में उभरकर आती है.
जाने कितनी ही हवाएं पास से गुज़र जाती हैं, मगर छू नहीं पातीं, कितनी बार कोई कुछ कहकर पास से निकल जाता है मगर शब्‍द मन को छू  नहीं पाते...कितना कुछ है जीवन में, जो बहुत पास है, छूने को आतुर भी है पर जि़न्‍दगी है कि अनछुई ही रहती है. क्‍या है जो छूट गया और वो क्‍या है जिसे छूने को व्‍याकुल है हर पल जिन्‍दगी.... ढेरों सवाल भी है और उलझनें भी.... सेमंत हरीश की कविताएं इन सवालों के पास जाती हैं, कभी उन्‍हें पुचकारती हैं, कभी दुत्‍कारती हैं, धिक्‍कारती हैं..... इस पुचकार, दुत्‍कार और धिक्‍कार के बाद भी वे सवालो से अपनापा नहीं खोतीं. उन्‍हें सदैव साथ रखने का ही प्रयास करती हैं.
आज के मुश्किल समय में, जबकि सब कुछ अपने तक समेट लेने की ललक, लालच की हद से भी आगे  चली गई

है, तब केप्टन सेमन्त की कविताएँ  जीने की वो राह दिखाती हैं जिसमें दाता होने का सुख अमूल्‍य गुण की तरह स्‍थापित होता है. निजी अनुभवों से उपजी कविता निजी अनुभवों तक ही सिमट कर रह जाए तो वह कविता की दुर्भाग्‍यपूर्ण सीमा है. सेमंत की कविताएं इस सीमा का अतिक्रमण करने में सफल हैं. व्‍यक्ति से होकर समाज में व्‍यापती उनकी सहजता किसी बच्‍चे की सी जिद भले ही लगती हो पर इसके अलावा कोई विकल्‍प अब तक दिखता भी नहीं.इस संग्रह की कविताएं उस सहजता मे जीने का आमंत्रण है जहां आज भी कबूतर की उड़ान जीने का संदेश देती है, जहां आज भी नदी का पानी जीवन के बहाव को प्रतीक देता है, जहां आज भी मां का आंचल एक मां से विस्‍तार पाता हुआ प्रकृति को मां की तरह स्‍थापित करता है.उनका ये कविता संग्रह यहाँ से लिया  जा सकता है.

 

योगदान : केप्टन सेमन्त \'देव\
प्रकाशन दिनांक : 22-07-2012
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