संसाधन पुस्तक समीक्षा

भाव कलश - जापानी काव्य शैली ताँका का पहला हिंदी संकलन

"मन के भावों को शब्दों में उतारने के लिए दुनिया के कई देशों में अलग-अलग शैलियों का प्रयोग किया जाता है. भारत में जापान की कविता शैली हाइकू काफी लोकप्रिय है, अब भारतीय रचनाकार ताँका नामक जापानी शैली भी अपना रहे है. हाल ही में विश्व भर में फैले हिंदी के २९ कवियों की ताँका रचनाओं का एक संकलन-भाव-कलश - प्रकाशित हुआ है, पढ़िए इस अनूठे प्रयोग पर एक रिपोर्ट "

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ताँका शैली के के बारेमें कहा जाता है कि कि ये धागे से कपड़े तक का, बीज  से पौधे तक , रेखाओं से रंगदार चित्र तक या स्वरों से संगीत तक का सफ़र है. इसकी  खास बात ये है कि इसमें भावनाओं का विस्तार बहुत ही सहज और  संक्षिप्त रूप में किया जाता है. नेट पर हिंदी की लघुकथाओं को स्थापित करने वाले श्री रामेश्वरजी काम्बोज हिमांशु और डा. भावना कुंअर ने इस शैली से जुड़े हिंदी रचनाकारों को भाव कलश के माध्यम से एक नया फलक देने का प्रयास किया है. वैसे हिंदी के कुछ कवियों ने पहले भी इस शैली में रचनाएँ लिखी है, मगर संभवतः भाव कलश ताँका के संकलनों की पहली किताब है.
इसमें श्री काम्बोज और डा. भावना के अलावा डॉ. हरदीप कौर सन्धु,सुधा गुप्ता, सुप्रीत कौर सन्धु, डा. अनिता कपूर, प्रो दविंद्र कौर सिद्धू,डॉ.अमिता कौंडल,डॉ.उर्मिला अग्रवाल सहित  विश्व भर में फैले २९ कवियों के पांच सौ से भी अधिक ताँका सँजोए गए है.
इनमें नन्हीं रचनाकार सुप्रीत कौर सन्धु की रचनाएँ भी शामिल है. वे अभी सिर्फ १३ वर्ष की है, मगर उनकी सोच में आसमान की ऊँचाई और सागर सी गहराई नज़र आतीहै. उनके ताँका पढ़कर  ये अंदाज लगाना कठिन है कि इन्हें लिखने वाली रचनाकार अभी कॉलेज में भी नहीं पहुँच पाई है. .

चली हवाएँ /पतझड़ में पत्ते/उड़ने लगे/रंगीन हुई हवा/चेहरा सहलाए !

इस संकलन में ज़िंदगी के कई रंग नज़र आते है. इसकी रचनाओं की एक बानगी यहाँ देखी जा सकती है.हरेक पंक्ति एक नई रचना की प्रथम पंक्ति है, इसलिए हर पंक्ति एक रचना की प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत है. 

दु:ख न कर/मेरे पागल मन/यही जीवन/हैं बबूल बहुत /कम यहाँ चन्दन .

शातिर लोग/मीठा जब बोलते/याद रखो कि/ज़हर वे घोलते/मुस्कान बिखेरते

नीम का पेड़/बहुत शरमाए/नटखट-सी/निबौंलियाँ उसको/खूब गुदगुगाएँ.

आँसू गठरी/खुलकर बिखरी/हर कोशिश/मैं समेटती जाऊँ/पर बाँध न पाऊँ.

न मिला कोई/काँधा रोने के लिए/बेबस आँसू/ख़ाक़ में गिरते थे/फ़ना होने के लिए .

पीपल -पींग /चढ़ी है आसमान /तीजो का चाव /सावन हरषाया /ओ माही लेने तो आ

फसल कटी/ कर्ज़ उतारा गया /हाथ हैं खाली/गोरी गूँथ रही है /दुःख -भूख का आटा

बरसी घटा /पानी-पानी हुई मैं/बरसी घटा/उम्र के नभ खिला/दर्दीला इंद्रधनुष.

पहाड़ी नदी/पहुँची सिंधु-तट/कदम रखे/सँभल- सँभलके/बिखरी हैं अलकें.

योगदान - डॉ. हरदीप कौर सन्धु/ डा. अनिताकपूर


प्रकाशन दिनांक : 22-02-2012
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