संसाधन पुस्तक समीक्षा

सरहदों को नहीं मानती स्मृतियाँ -ऋषभदेव शर्मा

"पढ़िए लेखक, पत्रकार और कवि सुबोध श्रीवास्तव के कविता संग्रह सरहदें की समीक्षा आचार्य ऋषभदेव जी द्वारा "

BOOK WRITER, POEM, POET, SUBODH

‘सरहदें’ में सुबोध श्रीवास्तव की 51 कविताएँ हैं जिन्हें दो खंडों में रखा गया है – 42 ‘सरहदें’ खंड में और 9 ‘एहसास’ खंड में. ‘एहसास’ में सम्मिलित रचनाओं को ‘प्रेम कविताएँ’ कहा गया है। 

 
‘वर्तमान का सच होते हुए भी सरहदें स्मृतियों और शुभेच्छाओं को बाधित नहीं करतीं। स्मृतियाँ और शुभेच्छाएँ किसी सरहद को नहीं मानतीं। कविमन भी किसी सरहद को कब मानता है! 
 
सरहद के इस पार के बच्चे जब उल्ल्हड़ मचाते सरहद के करीब से गुजरेंगे तो उस पार के बच्चे भी साथ खेलने को मचल उठेंगे – “फिर सब बच्चे/ हाथ थाम कर/ एक दूसरे का/ दूने उत्साह से/ निकल जाएँगे दूर/ खेलेंगे संग-संग/ गाएँगे गीत/ प्रेम के, बंधुत्व के/ तब/ न रहेंगी सरहदें/ न रहेंगी लकीरें.”
 
आतंक की खेती करने वालों को उनकी कविता सीधे संबोधित करते हुए कहती है – ‘तुम्हें/ भले ही भाती हो/ अपने खेतों में खड़ी/ बंदूकों की फसल/ लेकिन -/ मुझे आनंदित करती है/ पीली-पीली सरसों/ और/ दूर तक लहलहाती/ गेहूं की बालियों से  उपजता/ संगीत./ तुम्हारे बच्चों को/ शायद/ लोरियों सा सुख भी देती होगी/ गोलियों की तड़तड़ाहट/ लेकिन/ सुनो..../ कभी खाली पेट नहीं भरा करतीं/ बंदूकें,/ सिर्फ कोख उजाड़ती हैं’।
 
यादों में वह शक्ति है जिसके सामने सरहदें कायम नहीं रह पातीं। घर हो या समाज या देश या दुनिया – हृदय की रागात्मकता इनमें से किसी को भी हदों और सरहदों में बाँधने और बाँटने में यकीन नहीं रखती – ‘हमेशा/ कायम नहीं रहतीं/ सरहदें.../ याद है मुझे/ उस रोज/ जब/ अतीत की कड़वाहट/ भूलकर/ उसने/ भूले-बिसरे/ सपनों को फिर संजोया,/ यादों के घरौंदे में रखी/ प्यार की चादर ओढ़ी/ और/ उम्मीद की उंगली थामकर/चल  पड़ा/ ‘उसे’ मनाने./ तेज आवाज के साथ टूटीं/ सरहदें/ और/ रूठ कर गई जिंदगी/ वापस दौड़ी चली आई...।
 
मैं घुलना चाहता हूँ 
खेतों की सोंधी माटी में, 
रहना चाहता हूँ 
किसान के हल में, 
खिलखिलाना चाहता हूँ 
दुनिया से अनजान 
खेलते बच्चों के साथ,
हाँ, मैं चहचहाना चाहता हूँ 
सांझ ढले/ घर लौटते 
पंछियों के संग-संग, 
चाहत है मेरी 
कि बस जाऊं/ वहाँ-वहाँ 
जहाँ –
सांस लेती है जिंदगी 
और/ यह तभी संभव है 
जबकि 
मेरे भीतर जिंदा रहे
एक आम आदमी!
 
 
योगदान : सुबोध श्रीवास्तव
प्रकाशन दिनांक : 02-12-2017
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