हिंदी जगत

सूरज भी आ गया था आशिकी के दांव में..


कल घूमने गया था समंदर के गांव में,


हिचकोलियां खाती रही कश्ती बहाव में।


 


निकले उधर से जब वो समंदर ठहर गया,


तूफान खुद सवार थे उनकी नाव में।


 


सूरत को क्या बयां करूं वो हुस्न नूर था,


नजरें थीं आसमान पर इतना गुरूर था,


 


पायल कि वो झनकार सुन रहा हूं आज तक,


जादूगरी थी ऐसी कोई उसके पांव में।


 


थे होंठ सुर्ख और बदन मरमरी सा था,


था रूप कोई अप्सरा का या परी का था,


 


जुल्फों में घटाएं थीं चेहरे पे धूप थी,


सूरज भी आ गया था आशिकी के दांव में।। — अतुल

योगदान : Atul kushwah
प्रकाशन दिनांक : 05-04-2016
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